तुम्हारे जाने से पहले तक कुछ भी नहीं था चकित करने जैसा… एक नज्म (पदम सिंह)

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तुम्हारे जाने से पहले तक
कुछ भी नहीं था
चकित करने जैसा
घिरा था धुंध सा
छलावा
मेरे अस्तित्व के गिर्द
जाले थे
मेरी नज़रों पर
पलकों के बिछोने पर
न था
खरोंच का भी अंदेशा
टूटना ही था शायद
सो टूटा
रिश्ता ही था
या एक अनगढ़
तृषा
मिटटी थी कच्ची
या सिर्फ उन्माद
सर्जक का…
कुछ तो टूटा
पर अन्दर से
कुछ नया निकला है
जैसे नए मौसम में
नई कोपलें
नयी राहें …
नयी संभावनाएं
कच्ची मिटटी और…
अनंत आकाश…

Posted via email from हरफनमौला

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12 thoughts on “तुम्हारे जाने से पहले तक कुछ भी नहीं था चकित करने जैसा… एक नज्म (पदम सिंह)

    Amitabh Meet said:
    अप्रैल 1, 2010 को 9:47 अपराह्न

    बहुत बढ़िया ….

    टूटना ही था शायद
    सो टूटा
    रिश्ता ही था
    या एक अनगढ़
    तृषा
    मिटटी थी कच्ची
    या सिर्फ उन्माद
    सर्जक का…
    कुछ तो टूटा
    पर अन्दर से
    कुछ नया निकला है
    जैसे नए मौसम में
    नई कोपलें
    नयी राहें …
    नयी संभावनाएं
    कच्ची मिटटी और…
    अनंत आकाश…

    बहुत ही बढ़िया !!

    इस्मत ज़ैदी said:
    अप्रैल 2, 2010 को 9:25 पूर्वाह्न

    बहुत सुंदर कविता ,की तरह शब्दों का चयन बहुत अच्छा
    सो टूटा
    रिश्ता ही था
    या एक अनगढ़
    तृषा
    मिटटी थी कच्ची
    या सिर्फ उन्माद
    सर्जक का…

    बधाई

    RajeevBharol said:
    अप्रैल 2, 2010 को 10:15 पूर्वाह्न
    shekhar said:
    अप्रैल 2, 2010 को 1:15 अपराह्न
    rashmi prabha said:
    अप्रैल 2, 2010 को 2:06 अपराह्न

    कुछ तो टूटा
    पर अन्दर से
    कुछ नया निकला है
    जैसे नए मौसम में
    नई कोपलें
    नयी राहें ……वाह

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    अप्रैल 3, 2010 को 10:28 अपराह्न

    तुम्हारे जाने से पहले तक
    कुछ भी नहीं था
    चकित करने जैसा

    इन पंक्तियों ने जान ले ली….

    aradhana said:
    अप्रैल 3, 2010 को 10:45 अपराह्न

    इस कविता के लिये मैं बस इतना कहूँगी— बहुत सुन्दर !

    प्रवीण पाण्डेय said:
    अप्रैल 6, 2010 को 8:25 पूर्वाह्न

    लयबद्ध, उत्कृष्ठ, भावप्रवण व मनन करने योग्य ।

    shivangi said:
    अप्रैल 8, 2010 को 12:28 पूर्वाह्न

    तुम्हारे जाने से पहले तक
    कुछ भी नहीं था
    चकित करने जैसा ..
    ये पंक्तियाँ पढने के लिए बाध्य करती हैं, रोमांच, भाव और लय से पूर्ण रचना.

    Manju Mishra said:
    जून 25, 2010 को 3:49 पूर्वाह्न

    कुछ तो टूटा
    पर अन्दर से
    कुछ नया निकला है
    जैसे नए मौसम में
    नई कोपलें
    नयी राहें …… बहुत सुन्दर !

    रंजना सिंह said:
    अगस्त 20, 2010 को 3:04 अपराह्न

    अफ़सोस है मुझे कि अबतक आपके ब्लॉग तक क्यों नहीं पहुँच पायी थी….
    खैर संयोग शायद इसी को कहते हैं…

    माता सदा सहाय रहें आपपर…

    vishal mehta said:
    दिसम्बर 18, 2010 को 2:40 पूर्वाह्न

    दिल को छु गयी आपकी पन्क्तिया ।

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