खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

जफा की धूप में अब्र-ए-वफ़ा की शाद रखता हूँ

इसी तरहा मोहोब्बत का चमन आबाद रखता हूँ


छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू

यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ


मै अपनी जिंदगी के और ही अंदाज़ रखता हूँ

अना को भूल जाता हूँ फ़ना को याद रखता हूँ


कभी चाहत की धरती पर गजल के बीज बोये थे

फसल शादाब रखने को दिले बर्बाद रखता हूँ


कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए

कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ


हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे

कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ


कहाँ से कब नयी मंजिल का रस्ता खोज ले आये

खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ


अब्र-ए-वफ़ा =  वफ़ा के बादल

शादाब= हरा भरा

अना = अहं

Posted via email from हरफनमौला

17 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. अजित वडनेरकर
    मार्च 30, 2010 @ 18:10:37

    बहुत खूब भाई…

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे
    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ

    उम्दा ग़ज़ल। हर शेर दाद के काबिल

    प्रतिक्रिया

  2. Anita Singh
    मार्च 30, 2010 @ 18:15:03

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए

    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    वाह ! …….. तंज सटीक है

    प्रतिक्रिया

  3. ललित शर्मा
    मार्च 30, 2010 @ 18:22:39

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए
    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    वाह भाई पदम जी,

    मै हर शेर पर दाद रखता हुँ।

    बेहतरीन

    प्रतिक्रिया

  4. sharda arora
    मार्च 30, 2010 @ 18:24:57

    bahut khoob
    कभी चाहत की धरती पर गजल के बीज बोये थे
    फसल शादाब रखने को दिले बर्बाद रखता हूँ
    aur ye bhi khoob kaha …
    छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू
    यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ

    प्रतिक्रिया

  5. P.C.Godiyal
    मार्च 30, 2010 @ 18:28:39

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए

    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे

    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ

    कहाँ से कब नयी मंजिल का रस्ता खोज ले आये

    खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

    Bahut khoob ! laajabaab

    प्रतिक्रिया

  6. loksangharsha
    मार्च 30, 2010 @ 18:29:36

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे

    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ .nice

    प्रतिक्रिया

  7. इंदु पुरी
    मार्च 30, 2010 @ 20:12:06

    छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू
    यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ
    -यह गुण हर किसी में नही होता ,ईश्वर बहूत कम लोगों को देता है ,हमदर्दी पाने के लिए लोग झूठे आँसूं बहते हैं और तुम जो है उन्हें भी छिपाते हो ,गजब ढाते हो

    मै अपनी जिंदगी के और ही अंदाज़ रखता हूँ
    अना को भूल जाता हूँ फ़ना को याद रखता हूँ

    यहीं आ कर गडबड कर देते हो ,जिसे याद रखना है उसी को भूल जाते हो
    बिलकुल बजा नही फरमाते हो

    –‘ सुकूं ए दिल के वास्ते भूलने की आदत भी होनी चाहिए
    कब तक रहगी सुलगती यूँ ,ये आग ठंडी होनी चाहिए ‘

    खयालों के परिंदे को परवान चढने तो कि परवाज़ भी पाए

    इतना ही खुला रखना कि फिर अपने घर वापस लौट के आये

    प्रतिक्रिया

  8. rashmi prabha
    मार्च 30, 2010 @ 20:15:39

    कहाँ से कब नयी मंजिल का रस्ता खोज ले आये

    खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

    parindon ke paron ko padh phir ek gazal likhta hun……bahut badhiyaa

    प्रतिक्रिया

  9. chetana
    मार्च 30, 2010 @ 21:15:41

    bahoot sunder. dil se nikali panktiyan.

    प्रतिक्रिया

  10. Raghu
    मार्च 31, 2010 @ 00:12:40

    किस पंक्ति की सराहना की जीये .
    ये तय कर पाना आज मेरे लिए बहुत कठिन है !
    एक -एक पंक्ति का एक अपना अलग ही मजा है
    वाह जनाब वाह !

    प्रतिक्रिया

  11. aradhana
    मार्च 31, 2010 @ 00:41:03

    अच्छी लगी ग़ज़ल…पर कुछ शब्दों के अर्थ नहीं मालूम जैसे अना, अब्र ए वफ़ा और शादाब. कुछ-कुछ अंदाज़ा लगाया है, पर कठिन शब्दों के अर्थ दे देते तो अच्छा होता.

    प्रतिक्रिया

  12. समीर लाल
    मार्च 31, 2010 @ 08:33:23

    बेहतरीन गज़ल..हर शेर बोल रहा है!!

    प्रतिक्रिया

  13. Sulabh
    अप्रैल 01, 2010 @ 11:16:02

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए
    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे
    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ

    Ashaar Pasand aye

    प्रतिक्रिया

  14. इस्मत ज़ैदी
    अप्रैल 02, 2010 @ 09:20:24

    छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू

    यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ

    कभी चाहत की धरती पर गजल के बीज बोये थे

    फसल शादाब रखने को दिले बर्बाद रखता हूँ

    अच्छे ,बामानी अश’आर
    शुक्रिया

    प्रतिक्रिया

  15. Rizwaan
    अप्रैल 03, 2010 @ 17:17:22

    behtarin

    प्रतिक्रिया

  16. प्रवीण पाण्डेय
    अप्रैल 06, 2010 @ 08:28:02

    यूँ ही आजाद रखिये और हमें भी लाभान्वित कराईये उन आयामों से ।

    प्रतिक्रिया

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