खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

Posted on Updated on

जफा की धूप में अब्र-ए-वफ़ा की शाद रखता हूँ

इसी तरहा मोहोब्बत का चमन आबाद रखता हूँ


छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू

यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ


मै अपनी जिंदगी के और ही अंदाज़ रखता हूँ

अना को भूल जाता हूँ फ़ना को याद रखता हूँ


कभी चाहत की धरती पर गजल के बीज बोये थे

फसल शादाब रखने को दिले बर्बाद रखता हूँ


कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए

कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ


हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे

कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ


कहाँ से कब नयी मंजिल का रस्ता खोज ले आये

खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ


अब्र-ए-वफ़ा =  वफ़ा के बादल

शादाब= हरा भरा

अना = अहं

Posted via email from हरफनमौला

Advertisements

17 thoughts on “खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

    अजित वडनेरकर said:
    मार्च 30, 2010 को 6:10 अपराह्न

    बहुत खूब भाई…

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे
    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ

    उम्दा ग़ज़ल। हर शेर दाद के काबिल

    Anita Singh said:
    मार्च 30, 2010 को 6:15 अपराह्न

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए

    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    वाह ! …….. तंज सटीक है

    ललित शर्मा said:
    मार्च 30, 2010 को 6:22 अपराह्न

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए
    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    वाह भाई पदम जी,

    मै हर शेर पर दाद रखता हुँ।

    बेहतरीन

    sharda arora said:
    मार्च 30, 2010 को 6:24 अपराह्न

    bahut khoob
    कभी चाहत की धरती पर गजल के बीज बोये थे
    फसल शादाब रखने को दिले बर्बाद रखता हूँ
    aur ye bhi khoob kaha …
    छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू
    यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ

    P.C.Godiyal said:
    मार्च 30, 2010 को 6:28 अपराह्न

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए

    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे

    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ

    कहाँ से कब नयी मंजिल का रस्ता खोज ले आये

    खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

    Bahut khoob ! laajabaab

    loksangharsha said:
    मार्च 30, 2010 को 6:29 अपराह्न

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे

    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ .nice

    इंदु पुरी said:
    मार्च 30, 2010 को 8:12 अपराह्न

    छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू
    यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ
    -यह गुण हर किसी में नही होता ,ईश्वर बहूत कम लोगों को देता है ,हमदर्दी पाने के लिए लोग झूठे आँसूं बहते हैं और तुम जो है उन्हें भी छिपाते हो ,गजब ढाते हो

    मै अपनी जिंदगी के और ही अंदाज़ रखता हूँ
    अना को भूल जाता हूँ फ़ना को याद रखता हूँ

    यहीं आ कर गडबड कर देते हो ,जिसे याद रखना है उसी को भूल जाते हो
    बिलकुल बजा नही फरमाते हो

    –‘ सुकूं ए दिल के वास्ते भूलने की आदत भी होनी चाहिए
    कब तक रहगी सुलगती यूँ ,ये आग ठंडी होनी चाहिए ‘

    खयालों के परिंदे को परवान चढने तो कि परवाज़ भी पाए

    इतना ही खुला रखना कि फिर अपने घर वापस लौट के आये

    rashmi prabha said:
    मार्च 30, 2010 को 8:15 अपराह्न

    कहाँ से कब नयी मंजिल का रस्ता खोज ले आये

    खयालों के परिंदे इस लिए आज़ाद रखता हूँ

    parindon ke paron ko padh phir ek gazal likhta hun……bahut badhiyaa

    chetana said:
    मार्च 30, 2010 को 9:15 अपराह्न

    bahoot sunder. dil se nikali panktiyan.

    Raghu said:
    मार्च 31, 2010 को 12:12 पूर्वाह्न

    किस पंक्ति की सराहना की जीये .
    ये तय कर पाना आज मेरे लिए बहुत कठिन है !
    एक -एक पंक्ति का एक अपना अलग ही मजा है
    वाह जनाब वाह !

    aradhana said:
    मार्च 31, 2010 को 12:41 पूर्वाह्न

    अच्छी लगी ग़ज़ल…पर कुछ शब्दों के अर्थ नहीं मालूम जैसे अना, अब्र ए वफ़ा और शादाब. कुछ-कुछ अंदाज़ा लगाया है, पर कठिन शब्दों के अर्थ दे देते तो अच्छा होता.

      padmsingh responded:
      मार्च 31, 2010 को 3:15 अपराह्न

      माफ़ी चाहूँगा
      गलती सुधार कर ली गयी है

    समीर लाल said:
    मार्च 31, 2010 को 8:33 पूर्वाह्न

    बेहतरीन गज़ल..हर शेर बोल रहा है!!

    Sulabh said:
    अप्रैल 1, 2010 को 11:16 पूर्वाह्न

    कि उनकी बज्म में हस्ती हमारी बनी रह जाए
    कभी मै दाद रखता हूँ कभी इरशाद रखता हूँ

    हमारे बीच की अनबन, सुलगती रह गयी ऐसे
    कभी वो याद रखते हैं कभी मै याद रखता हूँ

    Ashaar Pasand aye

    इस्मत ज़ैदी said:
    अप्रैल 2, 2010 को 9:20 पूर्वाह्न

    छुपा लेता हूँ मै अक्सर तुम्हारी याद के आंसू

    यही थाती बचा कर अब तुम्हारे बाद रखता हूँ

    कभी चाहत की धरती पर गजल के बीज बोये थे

    फसल शादाब रखने को दिले बर्बाद रखता हूँ

    अच्छे ,बामानी अश’आर
    शुक्रिया

    Rizwaan said:
    अप्रैल 3, 2010 को 5:17 अपराह्न
    प्रवीण पाण्डेय said:
    अप्रैल 6, 2010 को 8:28 पूर्वाह्न

    यूँ ही आजाद रखिये और हमें भी लाभान्वित कराईये उन आयामों से ।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s