पतझड़ के बहाने

कई दिनों से कुछ लिखने का मन नहीं होता …. मन में वैराग्य सा है ,….
कोई हलचल नहीं होती …. पतझड़ का मौसम है एक तरफ जहां पुराने पत्र अपनी
आयु पूरी कर अधोमुख धाराशाई हैं वही  नूतन किसलय  नवसृजन का सन्देश दे रहे
हैं … सोचता हूँ क्या सन्देश देना चाहती है सृष्टि हमें इस मौसम के बहाने … नव सृजन का .. या पुरा पतन का … या इन दोनों का …. या समय की नियति का …
ऐसे में गीता का श्लोक अनायास ही सामने खिंच आता है
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।
नवानि गृह्णाति नरोsपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णानि।
अन्यानि संयाति नवानि देही।।

आज इसी परिदृश्य में अपनी एक पुरानी रचना पुनः प्रस्तुत करना चाहता हूँ –

विधना बड़ी सयानी रे
जीवन अकथ कहानी रे
तृषा भटकती पर्वत पर्वत
समुंद समाया पानी रे……..

दिन निकला दोपहर चढ़ी
फिर आई शाम सुहानी रे
चौखट पर बैठा मै देखूं
दुनिया आनी जानी रे……..

रूप नगर की गलियाँ छाने
यौवन की नादानी रे
अपना अंतस कभी न झांके
मरुथल ढूंढें पानी रे……..

जो डूबा वो पार हुआ
डूबा जो रहा किनारे पे
प्रीत प्यार की दुनिया की ये
कैसी अजब कहानी रे……..

मै सुख चाहूँ तुम से प्रीतम
तुम सुख मुझसे चाहोगे
दोनों रीते दोनों प्यासे
आशा बड़ी दीवानी रे…….

तुम बदले संबोधन बदले
बदले रूप जवानी रे
मन में लेकिन प्यास वही
नयनों में निर्झर पानी रे……….

Posted via email from हरफनमौला

16 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Dr.Manoj Mishra
    मार्च 16, 2010 @ 08:18:05

    दिन निकला दोपहर चढ़ी
    फिर आई शाम सुहानी रे
    चौखट पर बैठा मै देखूं
    दुनिया आनी जानी रे……..
    vaah man mst ho gya,bahut hee achhee laine.

    प्रतिक्रिया

  2. इस्मत ज़ैदी
    मार्च 16, 2010 @ 09:25:08

    बहुत सुंदर कविता ,
    पूरी कविता पाठक को अपनी लैबद्धता और भावों में बांध कर रखती है,
    और इतना बांध लेती है कि कविता का ख़त्म होना अच्छा नहीं लगता
    विधना बड़ी सयानी रे
    जीवन अकथ कहानी रे
    तृषा भटकती पर्वत पर्वत
    समुंद समाया पानी रे……

    वाह!

    प्रतिक्रिया

  3. समीर लाल
    मार्च 16, 2010 @ 09:26:51

    बहुत बढ़िया लगा..अच्छा किया पुरानी रचना प्रस्तुत कर दी..

    आपको नव संवत्सर की मांगलिक शुभकामनाएँ.

    प्रतिक्रिया

  4. SANJAY BHASKAR
    मार्च 16, 2010 @ 09:59:02

    बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    प्रतिक्रिया

  5. razia
    मार्च 16, 2010 @ 10:23:09

    तुम बदले संबोधन बदले
    बदले रूप जवानी रे
    मन में लेकिन प्यास वही
    नयनों में निर्झर पानी रे………
    अति भावुक!!!!

    प्रतिक्रिया

  6. sharda arora
    मार्च 16, 2010 @ 11:39:49

    लय बद्ध , जीवन के सूनेपन को इंगित करता गीत , एक दिन देहरी पर बैठ कर सूनी नजरें ऐसा सवाल जरुर करती हैं , खास कर ऐसे बदलते मौसम में …मार्च अप्रैल वाले दिनों में |

    प्रतिक्रिया

  7. indu puri
    मार्च 16, 2010 @ 17:48:58

    जो डूबा वो पार हुआ,
    डूबा जो रहा किनारे पे
    सब कुछ कह डाला इन दो पंक्तियों में
    कबीर ,ग़ालिब ,नानक उनसे पहले और उनके बाद
    सभी ऩे प्यार और प्यार के प्रभाव को इसी तरह जाना,पहचाना और लिखा ,मन में फिर प्यास वही रहेगी ना बाबा !
    प्यार के लहराते सागर के सामने खड़ा हो कर भी जिसने इसका रस पान नही किया वो प्यासा,उसकी आत्मा प्यासी अतृप्त तो रहेगी ना
    भटकना ही फिर मृग को अथाह मरु में
    तभी तो कहते हैं ‘पार उतरेगा वो ही खेलेगा जो तूफ़ान से’
    ये सुकूं देने वाला,पार लगाने वाला तूफान है जो मुक्ति देता

    2010/3/16

    प्रतिक्रिया

  8. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह
    मार्च 17, 2010 @ 07:25:41

    पद्म सिंह जी, आपकी कविता पढ़ा, जिस भाव के साथ आपने शब्‍दों का चयन किया वह प्रशंशनीय है।

    आपके ब्‍लाग पर आना सार्थक हुआ।

    प्रतिक्रिया

  9. loksangharsha
    मार्च 17, 2010 @ 07:50:25

    nice

    प्रतिक्रिया

  10. aradhana
    मार्च 18, 2010 @ 07:21:55

    आपकी कविता में कहीं न कहीं दर्शन आ जाता है, शब्दचयन, लयबद्धता तो आकर्षित करती ही है. सुन्दर रचना है भाव और शिल्प दोनों ही दृष्टि से.

    प्रतिक्रिया

  11. singhanita
    मार्च 18, 2010 @ 08:01:33

    ठीक कहा आपने आराधना जी ! कहीं न कहीं अनायास ही रचना दर्शन की और मुड जाती है, राजनीति पर लिखना रुचिकर नहीं लगता मुझे. यद्यपि कवि के लिए कोई विषय अछूता नहीं होना चाहिए. आप लोगों की सलाह मुझे अन्य विषयों की ओर भी ले जायेगा. आप लोगों का ब्लॉग पर आना मुझे शक्ति देता है. धन्यवाद

    प्रतिक्रिया

  12. Raghu
    मार्च 20, 2010 @ 11:34:53

    पद्म जी आपकी इस कविता की जितनी भी
    तारीफ की जाये कम ही है …
    बहुत सुन्दर कविता लिखी है आपने …बधाई स्वीकारें !

    प्रतिक्रिया

  13. हिमांशु
    मार्च 24, 2010 @ 18:01:06

    प्रवाह निरख रहा हूँ ! देर से आता हूँ, देर तक रहता हूँ इस ब्लॉग पर ! कविता की लय में बह रहा हूँ, उसके स्पन्दन से सिहर रहा हूँ !
    आभार ।

    प्रतिक्रिया

  14. Jolly Uncle
    अप्रैल 13, 2010 @ 10:37:46

    Beautiful poem……….Congrats………….

    प्रतिक्रिया

  15. Manju Mishra
    जुलाई 10, 2010 @ 07:19:23

    “जो डूबा वो पार हुआ
    डूबा जो रहा किनारे पे”

    इसी विरोधाभास में तो जिंदगी का दर्शन छुपा है

    प्रतिक्रिया

  16. Kosy spalinowe
    फरवरी 27, 2011 @ 02:00:44

    I have been absent for some time, but now I remember why I used to love this web site. Thank you, I’ll try and check back more often. How frequently you update your web site?

    प्रतिक्रिया

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