कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी (पदम सिंह)

कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी
समय सदा बलवान रहा पर विजय सत्य ने जानी


ये सच है, सच रोता भी है बोझ दुखों का ढोता भी है

किन्तु दुखों को सहकर के उत्साह नहीं वो खोता भी है

ऐसे मिट कर कितनों ने तासीर सत्य की जानी

कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी

श्वेत पत्र पर श्वेत कलम से जैसे कोई लिखता है

इसी तरह यदि दुःख ना हों आनंद कहाँ फिर दिखता है

बिना दुखों के सुख की कीमत बिलकुल है बेमानी

कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी


दुनिया को बदलो खुद सा, या दुनिया सा बन जाओ

औरों का अनुसरण करो या जग को राह दिखाओ

किन्तु समय वश में करने को क्रान्ति पड़ी अपनानी

कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी


मन बावरा फंसा रहता है सुख दुःख के घेरे में

केन्द्र बिंदु आनंद छोड़ कर भटक रहा फेरे में

दुनिया भर की ग्यानी दुनिया कैसी है दीवानी

कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी


कहीं नहीं पग चिन्ह छोड़ता खग उड़ता आकाश

ज्ञान तृषा तो बुझे तभी जब हो जा स्वयंप्रकाश

अंध अनुकरण करे किसी का, दुनिया की नादानी

कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी

Posted via email from हरफनमौला

6 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. राजीव तनेजा
    मार्च 08, 2010 @ 07:33:06

    इसी तरह यदि दुःख ना हों आनंद कहाँ फिर दिखता है
    बिना दुखों के सुख की कीमत बिलकुल है बेमानी…

    सत्य वचन….
    सटीक रचना

    प्रतिक्रिया

  2. mithilesh
    मार्च 08, 2010 @ 07:37:16

    nice

    प्रतिक्रिया

  3. समीर लाल
    मार्च 08, 2010 @ 07:58:34

    सटीक रचना….

    उम्दा अभिव्यक्ति!

    प्रतिक्रिया

  4. jayantijain
    मार्च 08, 2010 @ 08:53:39

    message is superb

    प्रतिक्रिया

  5. nirmla.kapila
    मार्च 08, 2010 @ 11:33:20

    इसी तरह यदि दुःख ना हों आनंद कहाँ फिर दिखता है

    बिना दुखों के सुख की कीमत बिलकुल है बेमानी

    कहते हैं विज्ञानी जग की यही कहानी
    बहुत सुन्दर सटीक रचना बधाई। 3 दिन छुट्टी पर रही इस लिये ब्लाग पर नही आयी। आशीर्वाद

    प्रतिक्रिया

  6. रवि कुमार, रावतभाटा
    मार्च 09, 2010 @ 00:01:28

    बेहतर…प्रस्तुति…

    प्रतिक्रिया

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