पागल पंछी नाचे क्यों (पदम सिंह)

पागल पंछी नाचे क्यों
सोने का पिंजरा ओ पंछी
बना हुआ अस्तित्व तुम्हारा
कनक कटोरी के दानों में
रची बसी जीवन की धारा
पराधीन तन मन आतप है
भूला निज स्वातंत्र्य तुम्हारा
संघर्षों से लड़ मरने से
भली तुम्हें लगती है कारा
अगर नहीं तो छोड़ चहकना
मिट्ठू मिट्ठू गाते क्यों ….
पागल पंछी नाचे क्यों

फूलों की डाली के बदले
झूठे चित्र सजा रखे हैं
छोड़ तरंगित मुक्त पवन को
कृत्रिम वाद्य बजा रखे हैं
भूल गए है पंख तुम्हारे
उड़ना पर्वत घाटी में
ढले हुए हैं भाव तुम्हारे
दुनिया की परिपाटी में
अंतः प्रज्ञा तज कर पगले
मिथ्या पोथी बांचे क्यों
पागल पंछी नाचे क्यों

धीरे धीरे पिंजरे के सुख
ऐसे तुमपर छा जायेंगे
कारा के भयमुक्त सुपल
उन्मुक्त गगन को खा जायेंगे
ऐसे में फिर खुली हवा में
साँसें लेने से डरता है
छोड़ सुरक्षित दीवारों को
उड़ना मुक्त बुरा लगता है
पराधीन होकर भी खुश हो
ऐसे भरे कुलांचे क्यों ……
पागल पंछी नाचे क्यों

अगम अगोचर मन का पिंजरा
अन्तस् की दीवारों सा
ऐसे में कुछ टूट गया है
प्राणों के स्वरधारों सा
जो तुमको अपना लगता है
वो सब केवल सपना है
गहरे पैठ खोज ले प्राणी
जो कुछ तेरा अपना है
मुक्ता मणि छोड़ कर कंकड़
पत्थर भला संवाचे क्यों
पागल पंछी नाचे क्यों

Posted via email from हरफनमौला

12 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. aradhana
    मार्च 05, 2010 @ 00:35:28

    वाह !!! सुन्दर कविता. जीवन दर्शन के गूढ़ रहस्य कह गये आप, सरल से शब्दों में.

    प्रतिक्रिया

  2. alpana
    मार्च 05, 2010 @ 01:19:36

    दुनिया की परिपाटी में
    अंतः प्रज्ञा तज कर पगले
    मिथ्या पोथी बांचे क्यों
    पागल पंछी नाचे क्यों
    waah!adbhut!
    bahut hi achchhee kavita hai.

    प्रतिक्रिया

  3. RaniVishal
    मार्च 05, 2010 @ 05:04:15

    Bahut Hi Sundar Abhivyakti !!

    प्रतिक्रिया

  4. हिमांशु
    मार्च 05, 2010 @ 05:30:11

    छन्द की सहजता दिखती है आपमें ! आप ऐसा रच रहे हैं, दुर्लभ है ।
    इसलिये ही मुरीद हूँ आपका !
    जीवन के रहस्य अनावृत करती कविता । आभार ।

    प्रतिक्रिया

  5. समीर लाल
    मार्च 05, 2010 @ 08:44:48

    बहुत सुन्दर..आनन्द आया.

    प्रतिक्रिया

  6. Swapna Manjusha 'ada'
    मार्च 05, 2010 @ 09:51:51

    kavita bahut hi goodh lagi..jeewan ke rahsyon ki or ingit karti hui..
    yah bhi ek bahut hi umda prastuti hai….hamesha ki tarah..

    प्रतिक्रिया

  7. शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    मार्च 05, 2010 @ 12:23:50

    धीरे धीरे पिंजरे के सुख….ऐसे तुम पर छा जायेंगे
    कारा के भयमुक्त सुपल….उन्मुक्त गगन को खा जायेंगे
    ………………पराधीन होकर भी खुश हो…..ऐसे भरे कुलांचे क्यों ……
    ………………..पागल पंछी नाचे क्यों

    कविता की सबसे अच्छी पंक्ति.

    प्रतिक्रिया

  8. nirmla.kapila
    मार्च 05, 2010 @ 14:07:37

    जो तुमको अपना लगता है
    वो सब केवल सपना है
    गहरे पैठ खोज ले प्राणी
    जो कुछ तेरा अपना है
    मुक्ता मणि छोड़ कर कंकड़
    पत्थर भला संवाचे क्यों
    पागल पंछी नाचे क्यों
    वाह वाह बहुत सुन्दर जीवन दर्शन। सार्थक अभिवयक्ती । शुभकामनायें

    प्रतिक्रिया

  9. padmsingh
    मार्च 05, 2010 @ 17:14:28

    इस पोस्ट पर इंदु पुरी आंटी के व्यूज़ कुछ इस तरह मिले हैं चस्पा कर रहा हूँ –
    डराते हो ?

    जिस डाल पर उड़ कर जाता
    कोई अपना-सा ही पा जाता है ,
    बिन मांगे ही नेह, सुरक्षा मिलती उसको
    मारे ख़ुशी के बौरा जाता है
    नन्हे से पद्म जी ये पागल पंछी
    झूम झूम नही मात्र नाचता
    सुनो , कुछ कुछ गाता है

    प्रतिक्रिया

  10. Raghu
    मार्च 20, 2010 @ 11:53:54

    पागल पंछी नाचे क्यों
    भाव विभोर कर दिया आपने तो …मस्ती ही आ गयी इस कविता को पढ़के

    बहुत बहुत शुक्रिया पद्म जी

    प्रतिक्रिया

  11. lekarstwa dla ryb
    फरवरी 27, 2011 @ 02:01:02

    Very good info can be found on site .

    प्रतिक्रिया

  12. vibha rani
    फरवरी 09, 2013 @ 09:33:40

    मंगलवार 12/02/2013को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं …. !!
    आपके सुझावों का स्वागत है …. !!
    धन्यवाद …. !!

    प्रतिक्रिया

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