लागल झुलनिया के धक्का बलम कलकत्ता निकरि गए …

हाँ तो भईया
भंग कर रंग जमा हो चकाचक फिर लो पान चबाय
ऐसा झटका लगे जिया पे पुनर्जनम होई जाय ………

केवल पान खाने से ??
और नहीं तो क्या…….
होली है कि जानती नहीं
और तमन्ना है कि मानती नहीं
होली भी मनानी है और मेहमानों को होली मिलन भी करवाना है ….
मंहगाई इतनी कि पान खाने से ही पुनर्जनम हो जाय
होली मनाएं भी तो कैसे ??
तो भईया सरकार के मंहगाई बढाने से क्या होता है
आज समानांतर सरकार जैसी समानांतर बाज़ार भी तो है हमारे पास….. मंहगाई
से निपटने के लिए

असली खोया(मावा) महगा हो …….. तो पाउडर का मिल जाएगा
असली दूध महगा हो …………. तो सिंथेटिक दूध है
रंग महगा हो …………. तो केमिकल है, जला मोबिल है.
सब्जी चाहिए………… तो दूध उतारने वाला इंजेक्शन लगा कर रातों रात
लंबी की हुई सब्जियां हैं
पिचकारी महगा हो …………तो सेकंड प्लास्टिक की टोक्सिक रंगों पिचकारियाँ हैं
और अगर होली खेलने को यार चाहिए तो ……….अपन है न (एकदम सस्ता टिकाऊ
और ओरिजिनल)

चलिए तो होली का जश्न शुरू हो चुका है …
हुआ यूँ कि मेरी कालोनी में बहुत से श्याने लोग हैं … जो होली खेलने
को अच्छा नहीं मानते
होली के नाम पर घर में घुस जाते हैं और बीवी के कहने पर भी दरवाज़ा नहीं
खोलते ….. कहते हैं आज तुम पर भी भरोसा नहीं ..
तीन साल पहले की बात है ……उस साल होली कि सुबह हुई तो सब कुछ नीरस सा
था …….लोग निकले ज़रूर पर बस अबीर का टीका लगाया और फार्मेल्टी कर
अपने घर में घुस गए ….. पर अपन का मन नहीं भरा था, अब हमारे कुछ मित्र
और पडोसी ऐसे भी थे जिनके मज़हब में होली खेलना मना है … लेकिन हम लोग
आपस में बहुत खुले हुए हैं .. इस लिए वे भी उत्सुकता से हमारे
क्रियाकलाप देख रहे थे और मन उनका भी हुडक रहा था …….
सलीम, अतहर, रोशन के साथ साथ और भी बहुत से दोस्त और पडोसी ये समझ कर
मेरे घर आ गए कि अब तो रंग खतम हो चुका है …. पर मैंने कुछ और इंतज़ाम
कर रखा था … और फिर जब शुरू हुई देसी होली तो बिना रंग के ऐसा रंग जमा
कि जो लोग कभी होली नहीं खेलते थे वो शाम चार बजे तक होली खेलते रहे और
शाम को इतने खुश…… बोले भईया ऐसी होली तो जिंदगी में नहीं खेली …..
ऐसा मज़ा कभी नहीं आया …… तो आज आपको उस की कुछ झलकियाँ दिखा रहा हूँ
….. पसंद आये तो आप भी आजमायें पर इसकी कीमत थोड़ी ज्यादा हो सकती है
और वो है —— आपका लान …… चलिए होली का मज़ा लीजिए इसी पर एक
होली गीत पेश है –

लागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकरि गए …

आवल फगुनवा के रुत मतवारी
कोयल कुकुहरे उछरि डारी डारी
गमके लागल पत्ता पत्ता ……
बलम कलकत्ता निकरि गए …
लागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकरि गए …

हमरे बलमुआ के कातिल नजरिया
इत उत लूटेंला पटना बजरिया
अइसन भुलाइ गए रस्ता
बलम कलकत्ता निकरि गए …
लागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकरि गए …

कौनो संदेसवा न भेजेला पइसा
तोड़े कमर मंहगाई बा अइसा
हालत भई हमरी खस्ता
बलम कलकत्ता निकरि गए …
लागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकरि गए ..
.

सहर जाइ बलमू के भाव बढ़ी गइले
ब्लागर भए कछु अऊर चढ़ी गइले
अबकी लिआउबे कौनो सस्ता
बलम कलकत्ता निकरि गए
लागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकरि गए …

निकरीलागल झुलनिया के धक्का
बलम कलकत्ता निकरि गए …

Posted via email from हरफनमौला

6 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. शिव कुमार मिश्र
    फरवरी 26, 2010 @ 17:02:41

    कमाल की पोस्ट है भैया…बाह बाह!!!

    प्रतिक्रिया

  2. Dr.Manoj Mishra
    फरवरी 26, 2010 @ 17:48:31

    अरे भइया एकदम रंगवान में डुबो कर मानेंगे का हो.
    रंगों से सरोबार लगी पोस्ट,आभार.

    प्रतिक्रिया

  3. शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    फरवरी 26, 2010 @ 22:30:53

    आदाब
    …अच्छा गीत रहा.
    बधाई
    होली की शुभकामनाएं

    प्रतिक्रिया

  4. समीर लाल
    फरवरी 27, 2010 @ 05:08:23

    गजब होली खेली जा रही है और पोस्ट भी उतनी ही मस्त!!

    आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

    प्रतिक्रिया

  5. हिमांशु कमार पाण्डेय
    फरवरी 27, 2010 @ 10:26:32

    सुनवाने की कोई व्यवस्था ?

    बहुत रंगभरी प्रविष्टि । आभार ।

    प्रतिक्रिया

  6. satish saxena
    फरवरी 27, 2010 @ 21:19:44

    अरे बाप रे अपनी जवानी याद आगई
    होली और मिलाद उन नबी की शुभकामनायें !

    प्रतिक्रिया

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