छोटा सा बडप्पन (पदमसिंह) –

जब भी उधर से गुजरता हूँ , नज़रें ढूंढती रह जाती हैं उसे
लेकिन फिर कभी नहीं दिखा मुझे वहां
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़  शहर के रेलवे स्टेशन का जिक्र करता हूँ
….. Friday, ‎February ‎24, ‎2006 दोपहर के बाद का समय था…हलकी धूप थी. गुलाबी ठण्ड में थोड़ी धूप अच्छी भी लगती है और ज्यादा धूम गरम भी लगती है … स्टेशन पर बैठा इंतज़ार कर रहा था और ट्रेन लगभग एक घंटे बाद आने वाली थी ….. बेंच पर बैठे बैठे जाने क्या सोच रहा था …
चाय ….. चाए …..की आवाजें या फेरी वालों की आवाजें रह रह कर मेरी
तन्द्रा तोड़ देतीं ……..वहीँ स्टेशन पर पड़े दानों के पीछे चार पांच कौए आपस में झगड़ने का उपक्रम कर रहे थे …जिनके खेल को मै बड़ी तन्मयता से बड़ी देर से देख रहा था … इसी बीच मुझे किसी के गाने की आवाज़ ने चौकाया ….. कोई गा रहा था दूर प्लेट फार्म पर … आवाज़ तो ठीक  थी ही थी पर जो कुछ वो गा रहा था उसके शब्द मुझे उस तक खीच ले गए …
कद लगभग ढाई से तीन फुट के बीच ही था उसका … पर उम्र लगभग ३० के आस पास रही होगी
उत्सुकता वश बहुत से लोग उसके करीब आ गए और गाना सुनते रहे ,….
किसी ने एक दो रूपया दिया भी उसे …. पर उसका गाने का ढंग और उसके गानों
का चयन मुझे छू गया था
कुछ देर बाद जब थोड़ी फुर्सत सी हुई तो मैंने उत्सुकता वश उसे अपने पास
बुलाया और बात करने लगा
बताया कि मेरा घर यही प्रतापगढ़ के पास चिलबिला स्टेशन के पास ही है
माँ बाप का इकलौता हूँ ….बाबा रहे नहीं ….. अम्मा हैं
.. अब मेरी हालत तो देख ही रहे हो बाबू
और कोई काम तो कर नहीं सकता
सिवाय इस के,…….
मुझे गाने का बहुत शौक था
तो गाने लगा हूँ बचपन से ही
……….मैंने कहा आज कल तो विकलांगों के लिए सरकार बहुत कुछ कर रही है
………. सरकार क्या करेगी ज्यादा से ज्यादा एक साइकिल देगी या फिर रेल
का किराया कम कर देगी
और कुछ कर नहीं सकता पढ़ा लिखा भी नहीं हूँ
………………………………………….
एक बार सर्कस वाले आये थे
कहने लगे चलो हमारे साथ
हम तुमको पैसे भी देंगे और देश बिदेस घूमना हमारे साथ
……. फिर?
पर साहब मेरी माँ का क्या होगा यहाँ पर … बाबा(पिता) रहे नहीं…….
अम्मा बीमार रहती हैं ….. दमे की मरीज़ हैं तो …….
अब उनकी देख रेख मै नहीं करूँगा तो कौन करेगा …..कहती हैं तू चला जा
सर्कस में ….. पर बाबू जी ……. अम्मा को छोड़ कर जाने का दिल नहीं
करता ….उसकी बातों में अम्मा के लिए प्रगाढ़ अपनापा और संवेदना झलक रही
थी

बहुत मयाती हैं हमको  अम्मा
और फिर औलाद किस दिन के लिए होती हैं
जौ हमहीं चले जायेंगे छोड़ कर ……. तो और कौन साथ देगा ?
आज देर होई गई आवे मा……. अम्मा की तबियत ज्यादा खराब होई जात है न
सर्दी मा..!!
आज तो हमरो तबियत कुछ ढीली है …….मगर का करी …. दवाई ले जाय का है
…… यही बरे आवे का पड़ा( इसी लिए आना पडा)
…..दिन भर में कितना ?
अरे दिन भर में कितना का ……. कभी 20-30 रुपिया तो कभी भीड़ भई तो
70-80 रुपिया भी होई जात है दिन भर मा …..
….
पर उसके स्वभाव में लाचारी नहीं दिखी मुझे ……. एक चमक थी आत्म
विश्वास की ……
मैंने ज्यादा पूछ ताछ करना ठीक नहीं समझा ……
मैंने कहा मेरे लिए एक दो गाने गाओगे?
बोला हाँ साहब क्यों नहीं
फिर अपने सोनी के मोबाइल फोन से उसका गाना रिकार्ड किया ……
जो कुछ हो सका दिया भी …..
पर अपनी माँ के लिए उस के भाव और बातें आज भी याद आती हैं
जब भी उधर से गुजरता हूँ , नज़रें ढूंढती रह जाती हैं उसे
लेकिन फिर कभी नहीं दिखा मुझे वहां पर

कभी कभी लगता है हम पढ़ लिख कर …… सर्विस, व्यापार के चक्कर में अपनों
से और अपने घर से इतनी दूर हो गए हैं …
पैसे, उपहार … चाहे जो भेज दें
पर अपने बड़ों के पैर छूने की अहक इस “बनावटी बडप्पन” में कहीं घुट जाती है…

मै ये भी आपको बताना चाहूँगा कि …. मैंने उस से ये भी कहा था कि मै
तुम्हरी बात अगर हो सका तो कहीं आगे ले जाऊँगा और तुम्हरी गाने की कला का
कोई कद्र दान ढूँढूँगा …… पर मेरे पास कोई ऐसा माध्यम नहीं था …इस
ब्लॉग के माध्यम से आज फिर सक्षम लोगों से गुज़ारिश करना चाहूँगा कि यदि
आप कुछ कर सकें तो मै दोबारा उसे ढूँढने की कोशिश करूँगा …

उसने जो गाया मै उस को लिख भी देता हूँ
हो सकता है कोई इस पोडकास्ट को सुन न पाए —

१- पढ़ने को मेरा उसने खत पढ़ तो लिया होगा
हर लफ्ज़ मगर कांटा बन बन के चुभा होगा

कसिद् ने खुशामद से क्या क्या न कहा होगा
शायद किसी भंवरे ने मुह चूम लिया होगा

शबनम के टपकने से क्या कोई कली खिलती
बेटा किसी बेवा का जब दूल्हा बना होगा
शादी में उस माँ का आंसू न रुका होगा

धनवान कोई होता तो धूम मची होती
निर्धन का जनाज़ा भी चुपके से उठा होगा
———————————————-
२-
सर झुकते नहीं देखा किसी तूफ़ान के आगे
जो प्रेमी प्रेम करते हैं श्री भगवान के आगे

लगी बाजार माया की इसी का नाम है दुनिया
यहाँ ईमान बिक जाता फकत एक पान के खाते
———————————————-

Posted via email from हरफनमौला

15 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. LalitSharma
    फरवरी 22, 2010 @ 19:32:57

    वाह! पदम सिग जी एक छोटी सी मुलाकात ने आपके हृदय पर गहरा असर किया है।
    माँ तो माँ होती है चाहे अमीर की हो या गरीब की, उसकी ममता की छांव मे सब दु:ख
    तकलीफ़ें दुर हो जाती हैं। बहुत ही यादगार वाकया हैं आभार

    प्रतिक्रिया

  2. अजित वडनेरकर
    फरवरी 22, 2010 @ 19:43:38

    बढ़िया…

    प्रतिक्रिया

  3. Swapna Manjusha 'ada'
    फरवरी 22, 2010 @ 22:15:34

    पद्म सिंह जी,
    आपकी प्रस्तुति बेहद्द हृदयस्पर्शी लगी….
    इसमें कोई शक नहीं कि आत्मविश्वास की यह एक मिसाल है…और हो भी क्यूँ नहीं …शरीर की सीमाएं, मन के विश्वास पर कब हावी हो पाती हैं….??
    सच में मैं मुग्ध हो गयी हूँ…इस छोटे से बड़प्पन पर…
    आभार…

    प्रतिक्रिया

  4. समीर लाल
    फरवरी 23, 2010 @ 00:01:39

    दिल को छूती..हर बात! क्या कहें..बस, बहुत समय तक याद रहेगी यह पोस्ट.

    प्रतिक्रिया

  5. राजीव तनेजा
    फरवरी 23, 2010 @ 00:56:45

    मर्मस्पर्शी पोस्ट …

    प्रतिक्रिया

  6. aradhana
    फरवरी 23, 2010 @ 01:30:07

    बहुत मार्मिक संस्मरण !!! ऐसे अनेक लोग आते-जाते हैं सबकी ज़िन्दगी में …कौन याद रखता है..? आप जैसे कुछ लोगों के सिवा…बहुत कुछ परिचित सा लगा…मेरे एक परिचित थे चिलबिला के…उस तरफ़ के स्टेशनों पर ऐसी बहुत सी प्रतिभाएँ दिख जाती हैं. भले ही बहुत परिपक्वता न हो, पर भाव बहुत होता है उनके गानों में… आप उसी भाव को पकड़ लाये हैं.
    पॉडकास्ट सुना…अच्छा लगा…आप बहुत भावुक हैं.

    प्रतिक्रिया

  7. हिमांशु
    फरवरी 23, 2010 @ 10:33:42

    हम तो पोस्टरस पर टीप आये हैं, पर प्रविष्टि ने छू लिया है सो रुक न सके यहाँ भी !
    इस मर्मस्पर्शी प्रविष्टि के लिये आभार ।

    प्रतिक्रिया

  8. शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
    फरवरी 24, 2010 @ 01:26:12

    सिंह साहब, आदाब
    मर्मस्पर्शी….आपका प्रस्तुतिकरण दिल को छूने वाला.

    प्रतिक्रिया

  9. nirmla.kapila
    फरवरी 24, 2010 @ 15:15:31

    दिल को छू लेने वाली मर्म्स्पर्शी रचना । पोडचास्ट भी बहुत अच्छा लगा धन्यवाद शुभकामनायें

    प्रतिक्रिया

  10. Raghu
    मार्च 20, 2010 @ 00:07:42

    छोटा सा बडप्पन
    बहुत कुछ कह दिया आपने इधर ..
    5-7 मिनिट तक तो कुछ लिखने की छमता ही न रही पूरी रचना पढने के बाद …
    बहुत बहुत बधाई हो …
    दिल तार तार हो गया आपकी ये रचना पढ़कर .
    एक बार पुनः आपको बधाई

    प्रतिक्रिया

  11. समीर लाल
    मार्च 01, 2011 @ 02:06:24

    बहुत मार्मिक

    प्रतिक्रिया

  12. RasaMdd
    मार्च 13, 2011 @ 05:42:47

    I looked at the video. My tears flowed … very much touched! God’s endless affection is in them! Not there, where the money, and power the lord!
    Blessings for him and everybody!

    प्रतिक्रिया

  13. Rakesh Kumar
    दिसम्बर 25, 2011 @ 21:58:43

    मार्मिक और हृदयस्पर्शी.

    सांपला में आपसे मिलन बहुत सुखद रहा.

    मेरे ब्लॉग पर आप पधारें
    तो यह मेरा सौभाग्य होगा.

    प्रतिक्रिया

  14. Trackback: जब अलबेला खत्री स्टेशन से उठाए गए … सांपला ब्लागर मीट 24-12-11 (भाग-1) « पद्मावलि

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