संवेदना , सहानुभूति और अभिव्यक्ति (पद्म सिंह)

……..बेटा पूरा खाना तैयार है
बस अगर लहसुन की कुछ पत्तियां ले आती तो चटनी बना लेती…… लहसुन की
पत्ती की चटनी खाए भी कई दिन हो गए हैं…
उस परिवार ने अपने छोटे से बगीचे में थोड़े से टमाटर, लहसुन, हरी धनिया
आदि की क्यारियां बना रखी थीं, जिनमे सुबह शाम थोडा काम कर के मन बहलाव
भी हो जाता … और छोटी छोटी ज़रूरतें भी पूरी होती … जब भी ज़रूरत हो
एक दो टमाटर ले लिया…. या हरी धनिया कुटक ली … ये घटना इसी क्रम के
दौरान हुई

बिटिया बोली……पर मम्मी शाम हो गयी है……..अँधेरा भी होने लगा है
ऐसे में पत्तियां कैसे तोड़ कर लाऊं
पेड़ भी तो सोने जा रहे होंगे (ये कभी पिता ने या माँ ने समझाया था कि रात
में पेड़ सोते हैं इस लिए इनके पत्ते नहीं तोड़ते इन्हें दुःख होता है )
कुछ बच्चे जिज्ञासु होते हैं और छोटी छोटी बात मन में रख लेते हैं
छह साल की बिटिया ने जाने क्या सोचा होगा उन पौधों के बारे में
पर माँ ने बात को टालते हुए उसकी जिज्ञासा और अपनी ज़रूरत दोनों का हल
निकालने की गरज से एक तरीका निकाला …….
हाँ बिटिया …बात तो ठीक कहा तुमने, पर एक तरीका हो सकता है
इस से पत्तियां भी मिल जाएँगी और पेड़ भी नाराज़ नहीं होंगे
…. वो कैसे ?
वो ऐसे ….. कि तुम पहले जाना उस लहसुन की क्यारी के पास
क्यारी से प्यार से पूछना …. क्यारी जी शाम हो गयी है…. पौधे सोने जा
रहे होंगे … पर आप अगर कहें तो दो चार लहसुन की पत्तियां ले लूँ..? इस
से उसे बुरा भी नहीं लगेगा और पत्तियां भी मिल जाएँगी
कुछ तो जंची बात … बिटिया गयी क्यारियों में ….. करीब दस मिनट बाद
लौटी तो उस के हाथ में कुछ नहीं था … और मुह लटका हुआ था …. माँ ने
पूछा बेटा क्या हुआ … ले आई पत्तियां ?
इस पर बेटी ने जो जवाब दिया उस ने माँ और पिता दोनों को स्तब्ध और सोचने
पर मजबूर कर दिया …
उस ने मुंह लटका कर जवाब दिया … मम्मी मैंने कई बार क्यारी से
पूछा……….लेकिन वो तो ……………
वो तो……???
…….लेकिन वो तो मना कर रही है
………………………………………….
उसके इस मासूम जवाब का कोई उत्तर नहीं था….. बनिस्बत इस के कि बिना
चटनी के खाना खाया जाता ….उसने बड़ी गहराई से इस बात को स्वीकार कर लिया
था कि पौधों को भी तकलीफ होती होगी .
ये प्रसंग कोई खास भले न हो पर एक बच्चे की सहज संवेदना और सहानुभूति को
दर्शाने के लिये पर्याप्त है जो उसके मन में पौधों के लिए उस समय जागी.
आज के प्रतिस्पर्धा और महत्वाकांक्षा से भरे वातावरण ने मनुष्य मात्र से
संवेदना और सहानुभूति को सोख लिया है… जीविका के दिन ब दिन दुष्कर होते
जाने और अस्तित्व में बने रहने की जद्दोजहद ने मनुष्य से उसकी सहजता और
मानवता को भी छीनना शुरू कर दिया है….जीने का ट्रेंड बदल रहा है …
अपने लक्ष्य की प्राप्ति कि लिए अगर कई अन्य के लक्ष्यों का खून होता है
तो कोई हर्ज नहीं दीखता इस में… और ये बदलाव समाज के हर स्तर पर
परिलक्षित हो रहे हैं … आज योग्यता, व्यक्तित्व और सामाजिक स्तर के
मानक बदल रहे हैं. और ये परिवर्तन शहर की सीमायें तोड़ गाँव की हवाओं में
भी अपना असर दिखा रहे हैं… आज के गाँव वो गाँव नहीं रह गए हैं … शहर
के भूत बन कर रह गए हैं

मुझे याद है किसी समय इलाहाबाद के उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र
में हमारे एक नाटक का रिहर्सल चल रहा था … तो एक दिन उस समय के मंच के
जाने माने और अनुभवी व्यक्तित्व सान्याल जी (पूरा नाम याद नहीं) ने हमें
अपना बहुमूल्य एक घंटा दिया था …उनकी बहुत सी बातें तो व्यक्तित्व में
उसी समय विलय हो गयीं और जीवन मन्त्र बन गयीं … चंद याद हैं आज भी …
उन्हों ने कहा था … यदि हम कला या साहित्य की किसी भी विधा में जाएँ,
अपने आप को कलाकार या साहित्यकार कहलाने का हकदार मानें …तो हमारा पहला
दायित्व यही है कि हम संवेदनशील हों…हमें समाज की हर हरकत को उसकी
सम्पूर्णता के साथ अनुभव करने की आवश्यकता होगी … हम उतनी ही ईमानदारी
और उतनी ही सम्पूर्णता से अपनी अभिव्यक्ति समाज तक पहुंचा सकते हैं जिनती
सम्पूर्णता से उसे हमने समाज से ग्रहण किया है … अगर आप अपना कटोरा
औंधा कर के चलेंगे तो वो टन टन तो करेगा पर अंदर से खाली ही रहेगा …
समाज में अगर किसी के साथ अन्याय हो और आपको नींद आ जाय या किसी के दुःख
देख कर आपको हंसी आये तो आप सच्चे अर्थों में कलाकार, लेखक, या समाजसेवी
कहलाने के हकदार नहीं हैं … आप सिवाय कागज़ के फूलों से ज्यादा कुछ
नहीं… आप किसी घटना को उस की उसी तीव्रता के साथ अनुभव करने में अगर
सक्षम हैं.. तो आपको शायद किसी विधा की ट्रेनिंग लेने या अभ्यास करने की
भी आवश्यकता न होगी … आपको सिर्फ ईमानदारी से संवेदनशील होना होगा …
किसी घटनाको उसकी सम्पूर्णता के साथ ग्रहण करना होगा … और उसके बाद
अभिव्यक्ति जो आएगी वो निश्चय ही आपकी मौलिक होगी …….और ये बातें
मुझे जीवन के हर मोड़ पर याद आ जाती हैं…
…………..(आज इतना ही )

Posted via email from हरफनमौला

4 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Dipak 'Mashal'
    फरवरी 10, 2010 @ 02:58:26

    kafi achchha likhte hain aap Padm ji.. na sirf bhav aur samvedna ke sath balki lekhan ke vyakaran ka dhyan rakhte hue..

    प्रतिक्रिया

  2. समीर लाल
    फरवरी 10, 2010 @ 06:20:51

    सही कहा आपने, इन्सान का संवेदनशील होना बहुत आवश्यक है. बढ़िया आलेख.

    प्रतिक्रिया

  3. हिमांशु
    फरवरी 10, 2010 @ 06:30:44

    सुगठित प्रविष्टि ! एक पंक्ति पकड़ ली मैंने – ’हमें बस ईमानदारी से संवेदनशील होना होगा ।……और उसके बाद अभिव्यक्ति जो आयेगी निश्चय ही वह मौलिक होगी । ”

    इस सुन्दर प्रविष्टि का आभार ।

    प्रतिक्रिया

  4. राजीव तनेजा
    फरवरी 15, 2010 @ 09:08:52

    आपने बिलकुल सही कहा…इन्सान का संवेदनशील होना बहुत ही ज़रुरी है…
    सीख देता एक बहुत ही बढ़िया आलेख

    प्रतिक्रिया

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