अम्मा

जाड़े की सुबह

एकदम तडके ही

मेरे तापने को

अलाव जला देती हैं

फिर ओखली में कुटे

मांड वाले चावल के लिए

अदहन चढा देती हैं

बहुत जतन से मुझे पोसती हैं अम्मा

मुझे नहलाती है कस कस के

जमी हुई कीचट साफ करती हैं

मै सिसियाता हूँ ठण्ड से

वो गरियाती है मुओं को

जो मुझे खेलने को साथ ले गए

फिर अनायास मुझे देख मुस्का देती हैं अम्मा

हथेली में मेरा चेहरा पकड़

तेलहुंस बालों में कंघी करती हैं

आँखों में काजल डाल

माथे पर डिठौना लगाती हैं

और एक पल में

राजा बाबू बना देती हैं अम्मा

मुझे मेरे भगवान दिखाती हैं

झुक कर प्रणाम करवाती हैं

या किताबों के फटने पर

विद्या माता का डर दिखाती हैं

और कुछ इसी तरह मुझमे

आस्था का दीप जलाती हैं अम्मा

होली की सुबह

उबटन लगाती हैं

सरसों के दाने उवार कर

फिर कच्चे धागे से मेरी नाप ले

होलिका मैया में डाल देती है

और अगले साल मेरे बड़े हो जाने का

स्वप्न सजाती हैं अम्मा

द्वार पर किसी याचक बाबा को

मेरे हाथों छोटी सी टोकरी से

धान दिलवाती हैं और

इसी तरह मेरे लिए

बहुत से असीस इकठ्ठा करती हैं अम्मा

स्कूल से जल्दी भाग आने पर

या मेरे माटी में खेलने पर

मुझे डांटती हैं

कभी कभी गाल को लाल

या कान को खटाई कर देती हैं अम्मा

और इसी बहाने

यादों में ही सही

एक एक संस्कार

फिर से जगाती हैं

संवारती हैं मुझे

मेरी सब पूंजी

बनावटी उसूल

परत दर परत चेहरा

सब छीन कर

दो पल को

मेरा बचपन लौटा देती हैं अम्मा


// //

10 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. समीर लाल
    फरवरी 04, 2010 @ 08:58:13

    एक पल में
    राजा बाबू बना देती हैं अम्मा

    -ओह! भावुक कर दिया भाई!!

    प्रतिक्रिया

  2. indu puri
    फरवरी 04, 2010 @ 10:18:21

    ……………………………………………..
    …………………………………………….
    …………………………………………..
    …………………………………………..
    ????? kya likhun?

    प्रतिक्रिया

  3. nirmla.kapila
    फरवरी 04, 2010 @ 10:29:47

    मेरी सब पूंजी

    बनावटी उसूल

    परत दर परत चेहरा

    सब छीन कर

    दो पल को

    मेरा बचपन लौटा देती हैं अम्मा
    माँ के प्यार और कुरबानी की कोई मिसाल नही कोई विकल्प नही बहुत सुन्दर कविता है बधाई

    प्रतिक्रिया

  4. aradhana
    फरवरी 04, 2010 @ 23:55:06

    क्या बात है? कल मुझे भी आपकी तरह अम्मा बहुत याद आ रही थी. बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता है. अब इससे आगे क्या कहूँ?…बस… आप की अम्मा है और मेरी थी….

    प्रतिक्रिया

  5. vaibhav singh
    फरवरी 05, 2010 @ 08:46:57

    chacha ye to apne apni amma ke upar likh diya………………………yad aa gayi amma ki…………..awesome…!

    प्रतिक्रिया

  6. poonam
    फरवरी 06, 2010 @ 10:10:29

    if you live in such surroundings,u feel that such emotions.I am a mother of two .aur meri maa bhi thik yaisi hai .very nice poem .

    प्रतिक्रिया

  7. anil kant
    फरवरी 06, 2010 @ 11:20:58

    माँ से संबंधित हर कविता बहुत अच्छी होती है. आपकी कविता मुझे बहुत पसंद आई.

    प्रतिक्रिया

  8. हिमांशु
    फरवरी 08, 2010 @ 21:52:25

    माँ शब्द के पीछे छुपी सारी संवेदना उघर गयी अभी ! बेहद भावुक कर देती हैं यह प्रविष्टियाँ । आभार ।

    प्रतिक्रिया

  9. Raghu
    मार्च 20, 2010 @ 00:31:52

    और अगले साल मेरे बड़े हो जाने का

    स्वप्न सजाती हैं अम्मा

    द्वार पर किसी याचक बाबा को

    मेरे हाथों छोटी सी टोकरी से

    धान दिलवाती हैं और

    इसी तरह मेरे लिए

    बहुत से असीस इकठ्ठा करती हैं अम्मा

    और अगले साल मेरे बड़े हो जाने का

    स्वप्न सजाती हैं अम्मा

    द्वार पर किसी याचक बाबा को

    मेरे हाथों छोटी सी टोकरी से

    धान दिलवाती हैं और

    इसी तरह मेरे लिए

    बहुत से असीस इकठ्ठा करती हैं अम्मा

    प्रतिक्रिया

  10. Raghu
    मार्च 20, 2010 @ 11:48:08

    अम्मा ..वो अम्मा …

    स्वप्न सजाती हैं अम्मा

    द्वार पर किसी याचक बाबा को

    मेरे हाथों छोटी सी टोकरी से

    धान दिलवाती हैं और

    इसी तरह मेरे लिए
    बहुत से असीस इकठ्ठा करती हैं अम्मा

    पर हम अम्माजी के लिए क्या करतें है ?
    अम्माजी ने तो क्या नहीं किया हमारे लिए . वाह मेरी अम्मा .
    अम्माजी पर कुछ भी कहा जाये बहुत अच्छा लगता है .दिल तक छु जाती है बात

    प्रतिक्रिया

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