रात बहुत जज्बाती होगी

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शाम धुंधलके में टहनी पर
चिड़िया कोई गाती होगी
मित्र हमारे पीछे अपनी
तन्हाई बतियाती होगी
एक कसक यादों की मन में
वही तुम्हारी थाती होगी
याद किसी की आती होगी
चाँद उफक पर धीरे धीरे
बदरी में तिर  जाता होगा
अश्रु मचल कर पलकों पलकों
अंधियारा घिर आता होगा
देर रात जलती आँखों में
नींद नहीं फिर आती होगी
रात बहुत जज्बाती होगी
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5 thoughts on “रात बहुत जज्बाती होगी

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    फ़रवरी 4, 2010 को 7:32 अपराह्न

    रात भले जज़्बाती हो…
    दिन को ज़मीनी बनाए रखना चाहिये…

    बेहतर…

    अजित वडनेरकर said:
    फ़रवरी 4, 2010 को 7:46 अपराह्न

    सुंदर अभिव्यक्ति…
    जज्बाती नज्म …

    शाहिद मिर्जा शाहिद said:
    फ़रवरी 5, 2010 को 12:54 पूर्वाह्न

    सिंह साहब, आदाब
    …….एक कसक यादों की मन में ….
    …………देर रात जलती आँखों में
    …………नींद नहीं फिर आती होगी
    ………….रात बहुत जज्बाती होगी
    बहुत बुलंद एहसास पेश किये हैं
    जेहन को जैसे ताजगी मिल गयी

    राजीव तनेजा said:
    फ़रवरी 7, 2010 को 6:56 अपराह्न

    कविता की मुझे ज़्यादा समझ नहीं है लेकिन फिर भी आपकी कविता अच्छी लगी

    हिमांशु said:
    फ़रवरी 8, 2010 को 9:54 अपराह्न

    मैं तो आपकी कविताओं की सजलता और गति का मुरीद हो गया हूँ । अदभुत ।
    आभार ।

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