कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

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कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

स्वप्न दिखा कर दूर गए तुम

रूठ गए मधुमीत ..

कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

 

मुझको अपने अंग लगा लो

व्याकुल मन की प्यास बुझा दो

प्रीति करो परतीति न जानो

ठीक नहीं यह रीत ..

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

नंदन वन के विटप मनोहर

खग कलरव, मधुसिक्त सरोवर

ऐसे में तुम्हरे बिन प्रियतम

नीरस जीवन गीत,

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

कैसी लई परीक्षा मोरी

सौतन बन आई सुधि तोरी

मन वीणा के तंतु विखंडित

रूठ गया संगीत..

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

छलना था तो छलने आते

निज सर्वस्व लूट ले जाते

जब जब चाहा हारूँ तुमसे

पुनि पुनि जाऊं जीत,

कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

 

 

 

 

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19 thoughts on “कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

    अजित वडनेरकर said:
    जनवरी 31, 2010 को 2:00 पूर्वाह्न

    सुंदर गीत

    समीर लाल said:
    जनवरी 31, 2010 को 4:45 पूर्वाह्न

    छलना था तो छलने आते
    निज सर्वस्व लूट ले जाते
    जब जब चाहा हारूँ तुमसे
    पुनि पुनि जाऊं जीत,
    कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

    -क्या बात है, बहुत उम्दा!!

    हिमांशु said:
    जनवरी 31, 2010 को 6:28 पूर्वाह्न

    मनोहारी गीत ! पछता रहा हूँ अब तक क्यों नहीं देखा यह ब्लॉग । लोक-शब्दों के प्रयोग ने तो अत्यन्त ही प्रभावपूर्ण बना दिया है रचना को ।
    आभार । नियमित यात्री बन रहा हूँ इस राह का ।

    LalitSharma said:
    जनवरी 31, 2010 को 6:54 पूर्वाह्न

    दिलहरण है
    मनहरण है
    चित्तहरण के
    दोषी हो गए
    तुम्हारे गीत।
    समय मिले
    मिल जाना पगली
    मधुबन मे
    ॠतु परिवर्तन मे
    बासंती सांफ़ा पहने
    प्रतिक्षारत
    तुम्हारा मीत

    vani geet said:
    जनवरी 31, 2010 को 7:14 पूर्वाह्न

    कहो प्रिय कैसी तुम्हारी प्रीत ….
    विरहनी की पीड़ा कहते बन गया सुन्दर गीत ….

    singhanita said:
    जनवरी 31, 2010 को 7:51 पूर्वाह्न

    छलना था तो छलने आते
    निज सर्वस्व लूट ले जाते
    जब जब चाहा हारूँ तुमसे
    पुनि पुनि जाऊं जीत,
    कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत

    सच कहा … प्रीति में हारने जैसा सुख और कहाँ …

    nirmla.kapila said:
    जनवरी 31, 2010 को 10:02 पूर्वाह्न

    छलना था तो छलने आते

    निज सर्वस्व लूट ले जाते

    जब जब चाहा हारूँ तुमसे

    पुनि पुनि जाऊं जीत,

    कहो प्रिय…कैसी तुम्हरी प्रीत
    बहुत सुन्दर गीत है बधाई शुभकामनायें

    indu puri said:
    जनवरी 31, 2010 को 10:22 पूर्वाह्न

    मन मे झाँक एक बार देखो
    झूठी नही कभी थी तुमसे
    सखे मेरी प्रीत
    हर बार चाहा अब भी चाहुंगी
    जीत निश्चय ही हो तुम्हारी
    हर बार हारुं तुमसे और तुम जाओ जीत
    झूठी नही कभी थी तुमसे
    सखे मेरी प्रीत
    साथि बन के सम्बल देते
    शिशु बन आंचल मे छुपते
    मा सा दुलार लुटाते भी तुम
    असामान्य तुम थे मित्र मेरे
    असाधारण तुम्हारी प्रीत
    इतनी नही प्रीत मामुली तुम्हारी
    हर कोई पा ले थाह जिसकी
    सागर तुम, अन्ध महासागर है
    बाबा! तुम्हारी प्रीत ,पर…….
    सच !झूठी नही कभी थी मेरी…………..

    रवि कुमार, रावतभाटा said:
    जनवरी 31, 2010 को 12:39 अपराह्न

    बेहतर…
    गीत भी और प्रतिगीत भी…

    digamber said:
    जनवरी 31, 2010 को 1:31 अपराह्न

    कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत
    स्वप्न दिखा कर दूर गए तुम
    रूठ गए मधुमीत ..
    कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत …..

    प्रीत और विरह की रीत में रंगी सुंदर कविता ………

    indu puri said:
    जनवरी 31, 2010 को 2:37 अपराह्न

    …………………………………………………………………………..
    ………………………………………………………………………….
    ……………………………………………………………………………….
    ………………………………………………………………………….
    padh skte ho ? padho ise . kya likhaa hai jaante ho?
    nhi jaan skte ?shbdon se khelne wale kavitaen rachanaa jante ho tum sb .
    kavi ,kavyitriyan . .ek mamuli sa,samaanya sa sutr ‘pyar’ ko jiwan ka flsafaa bna lo .
    dono jiwan ,dono duniya me rahna saarthak ho jayega.
    viyog,viarah ki peer use hoti hai jo apne priyajn se door hota hai
    pr wo door ho hi kaise skta hai?
    pyar me kmi rhi hai, wrna jise pyar krte hain wo to aatma ka hissa bn jata hai.
    fir kaisi doori? fir kaise viyog geet?
    rachnaakaar! pyar ko jana hi nhi tumne, bachche ho.
    pr……………………likhte achchhaa ho

    dr.nirupama said:
    जनवरी 31, 2010 को 7:59 अपराह्न

    सुधि को सौतन कहना बिलकुल नयी उपमा है .बधाई . बहुत सुंदर है,

    Shahid Mirza Shahid said:
    जनवरी 31, 2010 को 10:50 अपराह्न

    ‘सिंह’ साहब आदाब
    प्रीत को केन्द्रित कविता काफी भावपूर्ण है.

    26 जनवरी को पोस्ट की गयी ‘
    ललकार और फटकार’ हर हिन्दुस्तानी की आवाज़ है
    ‘जज्बात’ पर भी ‘यादों की किरन’ में आपकी वाणी दूसरे अन्दाज़ में है
    मंथन पर 26 जनवरी को पोस्ट ग़ज़ल पसंद करने के लिये शुक्रिया

    वन्दना said:
    फ़रवरी 1, 2010 को 2:45 अपराह्न

    behad prabhavshali laybaddh geet nayika ke dard ko ujagar kar gaya.

    amrendra nath tripathi said:
    फ़रवरी 2, 2010 को 12:21 पूर्वाह्न

    @ प्रीति करो परतीति न जानो ..
    अरे भैया ! बाबा तुलसी दास कहे हैं यही बारे मा , वहू कै
    ध्यान राखौ न ! …
    ” जाने बिनु न होय परतीती |
    बिनु परतीति होय नहिं प्रीती || ”
    .
    अच्छा लिखत हौ .. बस जारी राखौ .. आभार ,,,

    aradhana said:
    फ़रवरी 2, 2010 को 12:45 पूर्वाह्न

    वाह कैसा सुन्दर गीत… और जैसा कि रवि जी ने कहा उतना ही सुन्दर प्रतिगीत…कितना भोला है आपका मीत…जो आपके गीत पर इतने भोलेपन से अपनी सफाई दे गया… बहुत भाग्यशाली हैं आप.
    आपकी बात मानकर मैंने अपने गीत में संशोधन कर लिया है.

    Raghu said:
    मार्च 20, 2010 को 11:38 पूर्वाह्न

    कहो प्रिय ,कैसी तुम्हारी प्रीत …

    क्या कहने है जी
    कमल ही कर दिया आपने तो पद्म जी !!!

    प्रवीण पाण्डेय said:
    अप्रैल 7, 2010 को 4:45 अपराह्न

    बहुत सुन्दर लेखन है आपका ।

    मुकुल said:
    अप्रैल 16, 2010 को 1:23 पूर्वाह्न

    मुझे बहुत पसंद आया

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