बिगड़ जाती है धूप

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पूरे दिन का सवेरे मज़मून गढ़ जाती है धूप

एक सफहा जिंदगी का रोज़ पढ़ जाती है धूप

मुंहलगी इतनी कि पल भर साथ रह कर देखिये

पाँव छू, उंगली पकड़ फिर सर पे चढ जाती है धूप

लांघती परती तपाती खेत, घर ,जंगल, शहर

इस तरह से रास्ते पे अपने बढ़ जाती है धूप

अब्र हो गुस्ताख, शब हो, या शज़र चाहे ग्रहन

सब के इल्जामात मेरे सर पे मढ जाती है धूप

देख सन्नाटा समंदर पे हुकूमत कर चले

शहर से गुजरी कि बित्ते में सिकुड़ जाती है धूप

पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर

जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप


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6 thoughts on “बिगड़ जाती है धूप

    अविनाश वाचस्‍पति said:
    जनवरी 16, 2010 को 7:54 अपराह्न

    गड़ती नहीं सदा गढ़ती है धूप
    बदल देती है कच्‍चे पक्‍के रूप

    धूप कैसी भी हो नहीं बिगाड़ती
    छांव कभी भी नहीं है दहाड़ती

    धूप का ही तो सारा कमाल है
    जग सारा हुआ मालामाल है

    indu puri said:
    जनवरी 16, 2010 को 8:31 अपराह्न

    धूप का मानवीयकरण
    विद्यार्थी भी है एक सफहा रोज पढ़ जाती है
    नटखट बच्चों सी भी है पाँव छू,कर अंगुली पकड़ी और सीधे सिर चढ़ जाती है
    यायावर,घुमक्कड़ बंजारों सी बस चलते रहना खेत ,खलिहान,नदी,जंगल शहर
    शरीर भी है सारे इलज़ाम ‘इनके’ सिर मढ़ देती है
    शहर में बित्ते सी क्यों ना सिकुड़ेगी भैया नवयुवती जो ठहरी
    जमाना ऐसा उस पर लफंगे क्या कम है शहर में
    पूस में शर्माती, जेठ में बिगड़ जाती है
    ये तो औरतों की अदाए है
    फिर ये तो नई नवेली दुलहन जो ठहरी नखरे तो दिखाएगी ना
    तुम्हारी …? हमारी प्यारी बहु ..धूप
    मिलाते रहना ऐसी ही अपने प्रिय जनों से .

    ramadwivedi said:
    जनवरी 17, 2010 को 2:51 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति…..कुछ पंक्तियाँ मेरी भी आपके लिए…

    धूप तडपाती भी है,
    धूप तरसाती भी है।
    शीत से अंग-अंग गले जब,
    धूप सहलाती भी है॥
    पूरी कविता अनुभूति कलश में देख सकते है….
    ——–

    dr.y.m.kaushik said:
    जनवरी 17, 2010 को 4:48 अपराह्न

    बहुत खूब लिखा है….बिगड जाती है धूप………..!

    अजित वडनेरकर said:
    जनवरी 21, 2010 को 5:33 अपराह्न

    पूस में दुल्हन सी शर्माती लजाती है मगर

    जेठ में छेड़ो तो इत्ते में बिगड़ जाती है धूप

    जबर्दस्त। इससे ज्यादा क्या कहूं। एक एक शेर दाद के काबिल है।

    mridula pradhan said:
    जनवरी 29, 2010 को 6:34 अपराह्न

    bahut hi achhi kavita hai,man khush ho gaya.

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