चमन को ऐसी बहार दे दो..

महक उठे हर शज़र का पत्ता
चमन को ऐसी बहार दे दो
जो आसमां को भी जगमगा दे
धरा को ऐसा सिंगार दे दो


जो नफरतों की मशाल बाले
अमन की कलियाँ कुचल रहे है
जो रहनुमा बन के गुल्शितान को
उजड़ने को मचल रहे है
तुम्हे कसम है मिटा दो उनको
गमे जिगर को करार दे दो

हम अपनी आहों के दायरे से
युगों युगों तक निकल न पाए
अजब अँधेरे की रात आई
चलो अमन के दिए जलाये
बुझा सके आतिश-ए- जुनूँ को
वो भाई भाई का प्यार दे दो

चलो कसम खाएं इस ज़मी पर
झुके नहीं परचम इस वतन का
न हम रहें हम न तुम रहो तुम
हम एक है की पुकार दे दो

जो आसमां को भी जगमगा दे
धरा को ऐसा सिंगार दे दो

2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. Krishna Kumar Mishra
    दिसम्बर 26, 2009 @ 23:22:26

    सुन्दर रचनायें व सुन्दर ब्लाग, बहुत खूब

    प्रतिक्रिया

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