ये सफर काट दो मौजों की रवानी बन कर…. एक गज़ल जीवन की

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ये सफर काट दो मौजों की रवानी बन कर

बीत जायेगी उमर एक कहानी बन कर

हसीन मयकदा-ए-इश्क मस्तियाँ-ऒ-शबाब

सब एक बार ही आते है जवानी बन कर

रुखसत-ए-यार के ग़म को भी कहाँ तक सोचें

वो भी कब तक रहेगा आँख का पानी बन कर

इस कदर गम कि घटाओं से न घबरा प्यारे

ये भी बरसेंगे तो बह जायेंगे पानी बन कर

ज़िन्दगी चिलचिलाती धूप के सिवा क्या है

प्यार आता है मगर शाम सुहानी बन कर

आज दुनिया को मेरे जज़्बों की परवाह नहीं

ख़ाक हो जाऊँ तो ढूँढेगी दीवानी बन कर

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5 thoughts on “ये सफर काट दो मौजों की रवानी बन कर…. एक गज़ल जीवन की

    अनीता सिंह said:
    दिसम्बर 22, 2009 को 10:09 पूर्वाह्न

    सच कहा जीवन तो रवानी का नाम है…. किसी के लिये वक्त रुकता नहीहै

    indu puri said:
    दिसम्बर 23, 2009 को 8:56 अपराह्न

    आज दुनिया को मेरे जज्बों की परवाह नही
    खाक हो जाऊंगा तो ढूंढेगी दीवानी बन कर
    क्या खूब लिखते हो पद्म आप !
    इश्वर आपकी कलम को ‘तेज’दे

    तिलक राज कपूर said:
    नवम्बर 13, 2010 को 6:18 अपराह्न

    हसीन, मयकदा-ए-इश्क, मस्तियाँ-ऒ-शबाब
    सब एक बार ही आते है जवानी बन कर।

    बात तो आपने सही कही मगर

    मज़ा तो तब है कि कट जाय उम्र ही सारी,
    कभी गुलाब कभी रात की रानी बन कर।

      padmsingh responded:
      नवम्बर 13, 2010 को 9:02 अपराह्न

      आपका मेरे ब्लॉग पर आना सुखद लगा … आप लोगों से बहुत कुछ सीखा है और सीखता रहूँगा

    समीर लाल said:
    दिसम्बर 31, 2011 को 11:40 अपराह्न

    नव वर्ष पर आपको और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनायें।

    -समीर लाल

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