भटकन

कितनी गलियाँ कितने मोड़
तेरी खातिर आया छोड़
भटकन तेरा  अंत नही है
जितनी गलियाँ उतने मोड़…..

5 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. padmsingh
    दिसम्बर 18, 2009 @ 03:02:20

    आप अपनी लाइने भी जोड़ सकते है … स्वागत है

    प्रतिक्रिया

  2. Krishna Kumar Mishra
    दिसम्बर 19, 2009 @ 04:50:39

    सुन्दर कविता

    प्रतिक्रिया

  3. indu puri
    दिसम्बर 20, 2009 @ 00:58:49

    भटकन को किसी चौराहा पर क्यों नही छोड़ देते
    भूल जाएगी जाना कहाँ है ,फिर भी मिल जाये
    तो मेरा पता दे देना ……………………
    भटकन जितना भटकाना है मैं हूँ अभी इन राहों में
    मेरे मासूमों को छोड़ आ मेरी फैली इन बाँहों में
    बहुत सुंदर लिखा है ,जरा और लम्बी लिखते मजा आ जाता

    प्रतिक्रिया

  4. nirmla.kapila
    दिसम्बर 27, 2009 @ 20:29:37

    बहुत अच्छा लिखते हो शुभकामनायें

    प्रतिक्रिया

  5. nirmla.kapila
    जनवरी 04, 2010 @ 13:41:23

    सुन्दर कवित बधाइ

    प्रतिक्रिया

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