11 फ़र 2013
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, पद्मसिंह, हिन्दी कविता

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रिश्ते बहुत गहरे होने होते हैं
उकता जाने के लिए
पढ़ता हूँ हर बार बस उड़ती निगाह से …
कि कहीं बासी न पड़ जाए
प्यास की तासीर
सारी उम्र साथ रहने की उम्मीद से बड़ा तो नहीं हो सकता
बिछोह का दर्द…
बारहा नज़रें चुरा लूँगा…
मगर यूं नहीं कि …
तुम्हें खो देने की हद पार करूँ
…. पद्म सिंह
02 जन 2013
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, कविता, हिन्दी
न जाने क्या हुआ है हादसा गमगीन मंज़र है
शहर मे खौफ़ का पसरा हुआ एक मौन बंजर है
फिजाँ मे घुट रहा ये मोमबत्ती का धुआँ कैसा
बड़ा बेबस बहुत कातर सिसकता कौन अन्दर है
सहम कर छुप गयी है शाम की रौनक घरोंदों मे
चहकती क्यूँ नहीं बुलबुल ये कैसा डर परिंदों मे
कुहासा शाम ढलते ही शहर को घेर लेता है
समय से कुछ अगर पूछो तो नज़रें फेर लेता है
चिराग अपनी ही परछाई से डर कर चौंक जाता है
न जाने जहर से भीगी हवाएँ कौन लाता है
ये सन्नाटा अचानक भभक कर क्यूँ जल उठा ऐसे
ये किसकी सिसकियों ने आग भर दी है मशालों मे
सड़क पर चल रही ये तख्तियाँ किसकी कहानी हैं
पिघलती मोमबत्ती की शिखा किसकी निशानी है\
न जाने ज़ख्म कब तक किसी के चीखेंगे सीने मे
न जाने वक़्त कितना लगेगा बेखौफ जीने मे
न जाने इस भयानक ख्वाब से अब जाग कब होगी
न जाने रात कब बीते न जाने कब सुबह होगी
न जाने दर्द के तूफान को कैसे सहा होगा
न जाने तुमने ऊपर वाले से क्या क्या कहा होगा
बहुत शर्मिंदगी है आज ख़ुद को आदमी कह कर
ज़माना सर झुकाए खड़ा ख़ुद की बेजुबानी पर
मगर जाते हुए भी इक कड़ी तुम जोड़ जाते हो
हजारों दिलों पर अपनी निशानी छोड़ जाते हो
अगर आँखों मे आँसू हैं तो दिल मे आग भी होगी
बहुत उम्मीद है करवट हुई तो जाग भी होगी
…..पद्म सिंह

28 जन 2012
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, पद्मसिंह, व्यंग्य, हास्य व्यंग्य
Tags: अन्ना, चुनाव, नेता, बाबा, भारत, व्यंग्य, स्त्रोक्तम, हास्य
24 जन 2012
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, कविता, हिन्दी, पद्मसिंह, हास्य व्यंग्य
Tags: अन्ना, कविता, जूता, बाबा, भारत, भ्रष्टाचार, रामदेव, हास्य
कई बार मज़ाक मे लिखी गयी दो चार पंक्तियाँ अपना कुनबा गढ़ लेती है… ऐसा ही हुआ इस जूता पचीसी के पीछे… फेसबुक पर मज़ाक मे लिखी गयी कुछ पंक्तियों पर रजनीकान्त जी ने टिप्पणी की कि इसे जूता बत्तीसी तक तो पहुँचाते… बस बैठे बैठे बत्तीसी तो नहीं पचीसी अपने आप उतर आई… अब आ गयी है तो आपको परोसना भी पड़ रहा है… कृपया इसे हास्य व्यंग्य के रूप मे ही लेंगे ऐसी आशा करता हूँ।
जूता मारा तान के लेगई पवन उड़ाय
जूते की इज्ज़त बची प्रभु जी सदा सहाय ।1।
साईं इतना दीजिये दो जूते ले आँय
मारहुं भ्रष्टाचारियन जी की जलन मिटाँय ।2।
जूता लेके फिर रही जनता चारिहुं ओर
जित देखा तित पीटिया भ्रष्टाचारी चोर ।3।
कबिरा कर जूता गह्यो छोड़ कमण्डल आज
मर्ज हुआ नासूर अब करना पड़े इलाज ।4।
रहिमन जूता राखिए कांखन बगल दबाय
ना जाने किस भेस मे भ्रष्टाचारी मिल जाय ।5।
बेईमान मचा रहे चारिहुं दिसि अंधेर
गंजी कर दो खोपड़ी जूतहिं जूता फेर ।6।
कह रहीम जो भ्रष्ट है, रिश्वत निस दिन खाय
एक दिन जूता मारिए जनम जनम तरि जाय ।7।
भ्रष्टाचारी, रिश्वती, बे-ईमानी, चोर
खल, कामी, कुल घातकी सारे जूताखोर ।8।
माया से मन ना भरे, झरे न नैनन नीर
ऐसे कुटिल कलंक को जुतियाओ गम्भीर ।9।
ना गण्डा ताबीज़ कुछ कोई दवा न और
जूता मारे सुधरते भ्रष्टाचारी चोर 10।
जूता सिर ते मारिए उतरे जी तक पीर
देखन मे छोटे लगें घाव करें गम्भीर ।11।
भ्रष्ट व्यवस्था मे चले और न कोई दाँव
अस्त्र शस्त्र सब छाँड़ि के जूता रखिए पाँव ।12।
रिश्वत खोरों ने किया जनता को बेहाल
जनता जूता ले चढ़ी, लाल कर दिया गाल ।13।
रहिमन काली कामरी, चढ़े न दूजो रंग
पर जूते की तासीर से भ्रष्टाचारी दंग ।14।
थप्पड़ से चप्पल भली, जूता चप्पल माँहिं
जूता वहि सर्वोत्तम जेहिं भ्रष्टाचारी खाहिं ।15।
रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिये डारि
जहाँ काम जूता करे कहाँ तीर तरवारि ।16।
जूता मारे भ्रष्ट को, एकहि काम नासाय
जूत परत पल भर लगे, जग प्रसिद्ध होइ जाय ।17।
भ्रष्ट व्यवस्था मे कभी मिले न जब अधिकार
एक प्रभावी मन्त्र है, जय जूतम-पैजार ।18।
जूता जू ताकत फिरें भ्रष्टाचारी चोर
जूते की ताकत तले अब आएगी भोर ।19।
रिश्वत दे दे जग मुआ, मुआ न भ्रष्टाचार
अब जुतियाने का मिले जनता को अधिकार ।20।
एक गिनो तब जाय के जब सौ जूता हो जाय
भ्रष्टाचार मिटे तभी जब बलभर जूता खाय।21।
दोहरे जूते के सदा दोहरे होते काम
हाथों का ये शस्त्र है पैरों का आराम ।22।
पनही, जूता, पादुका, पदावरण, पदत्राण
भ्रष्टाचारी भागते नाम सुनत तजि प्राण ।23।
जूते की महिमा परम, जो समझे विद्वान
बेईमानी के लिए जूता-कर्म निदान ।24।
बेईमानी से दुखी रिश्वत से हलकान
जूत पचीसी जो पढ़े, बने वीर बलवान ।25।
25 दिस 2011
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, poems
Tags: Anna, अन्ना, Baba Ramdev, India
छोड़ो भी ईमान की बातें
लूटें खाएं आधी आधी
सोचे कौन देश की बातें
आओ खेलें वादी वादी
जाति पांति मे बंटे रहेंगे
अपने हित पर डटे रहेंगे
तने रहे हैं तने रहेंगे
कैसे छोड़ेंगे परिपाटी
बने रहे हैं बने रहेंगे
हिन्दूवादी मुसलिमवादी
अन्ना-वादी बाबा-वादी
फूल नहीं हम खार रहेंगे
प्यार नहीं व्यापार रहेंगे
ना सुधरे थे ना सुधरेंगे
हम धरती पर भार रहेंगे
हँस कर सह लेंगे बरबादी
बेशक छिन जाये आज़ादी
लेकिन हम तो बने रहेंगे
अगड़ा-वादी पिछड़ा-वादी
नहीं स्वावलंबन लाएँगे
सस्ते का राशन खाएँगे
आरक्षण की भांग पिएंगे
जितना कुनबा उतना राशन
खूब बढ़ाएँगे आबादी
अपने ठेंगे से मर जाएँ
भगवा-वादी, खादी-वादी
अन्नावादी, बाबा वादी
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होने दो मंथन कोई तो हल निकलेगा
अमृत निकलेगा या कोई गरल निकलेगा
तप जाने दो स्वर्ण कलश सा दिखने वाला मौसम
ये तो समय बताएगा पीतल या कि कुन्दन निकलेगा
22 दिस 2011
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, व्यंग्य
Tags: अनशन, अन्ना, पद्म सिंह, भारत, भ्रष्टाचार, रामदेव
कई महीने हो गए ब्लॉग पर कुछ लिखे हुए…. लिखते रहने के अतिरिक्त कुछ करने की सोच कर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना और बाबा के साथ हो लिया…. हर अनशन, हर मोर्चे, और हर जुलूस मे कभी झंडे लिए तो कभी मोमबत्ती जलाए गले फाड़ता रहा…भारत माता की जय, वंदे मातरम, इंकलाब ज़िन्दाबाद…. लोगों ने अपने एयरकंडीशंड घरों से स्वतः निकल कर मोमबत्ती जलाई और हमारे साथ हो लिए… ऐसा लगने लगा जैसे अब क्रान्ति हो चुकी है… अब हो न हो देश से भ्रष्टाचार के काले बादल छंट जाएँगे… नया सवेरा आने ही वाला है… परन्तु सरकारी पैंतरों और गुलाटी खाते सत्तासीन चुने हुए(वास्तव मे छंटे हुए) प्रतिनिधियों को देख कर लोकतन्त्र और संसद की सर्वोच्चता का असल मतलब… और मकसद दोनों काफी कुछ(जितनी आम जनता की समझ की औकात है) समझ मे आई…. समझ तो आप को भी आ गयी होगी… पर पुनः ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करते हुए एक लोकोक्ति कहना चाहूँगा…
दो टके की हाँडी गयी तो गयी…. कुत्ते की जात तो पहचान मे आई
बस मन मे बहुत खुन्नस है… धीरे धीरे निकलेगी… फिलहाल इसे बाँच लीजिये…. लिख दिया… ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए…
भ्रष्टाचार, काला धन
बाबा का आंदोलन
अन्ना का अनशन
ज्वाइंट मीटिंग
सरकारी चीटिंग
लोगों का सपोर्ट
बाबा एयरपोर्ट
मान मनौवल
सरकारी सिर फुटौव्वल
बाबा का अनशन
सत्ता से अनबन
अनशन पर वार
बाबा तड़ीपार
अनशन पर शर्तें
साजिश की परतें
अन्ना को जेल
दमन का नंगा खेल
वार्ता, करार,
सोनिया फरार
राहुल को कमान
राम लीला मैदान
ओमपुरी का बयान,
संसद का अपमान,
अग्निवेश का फोन
मनमोहन का मौन
राहुल का बयान
मीडिया की उड़ान
स्थायी कमेटी,
सिंघवी की हेटी
पासवान की टांग
आरक्षण की मांग
सर्वदलीय मीटिंग
बैकडोर चीटिंग
फेसबुक निगरानी
दमन की कहानी
बार बार मीटिंग
भितरघात चीटिंग
नहीं बनी बात
धाक के पात
हाँ हाँ, ना ना
चीं चीं, काँ काँ
धीरे धीरे आम लोग
पक गए तमाम लोग
अन्ना बन गए हीरो
बंसी बजाए नीरो
हासिल रहा ज़ीरो…
कुल मिला कर ज़ीरो…
(ज़ीरो मतलब सुन्ना… “0″ मौज करो मुन्ना)
….. पद्म सिंह
09 सित 2011
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, कविता, हिन्दी, पद्म, पद्मसिंह, पद्मावलि, हिन्दी, हिन्दी कविता
Tags: आम आदमी, क्रान्ति, नेता, भारत, भ्रष्टाचार

हम आम आदमी हैं
किसी ‘खास’ का अनुगमन हमारी नियति है
हमारे बीच से ही बनता है कोई ‘खास‘
हमारी मुट्ठियाँ देती हैं शक्ति
हमारे नारे देते हैं आवाज़
हमारे जुलूस देते हैं गति
हमारी तालियाँ देती हैं समर्थन ….
तकरीरों की भट्टियों मे
पकाए जाते हैं जज़्बात
हमारे सीने सहते हैं आघात
धीरे धीरे
बढ़ने लगती हैं मंचों की ऊँचाइयाँ
पसरने लगते हैं बैरिकेट्स
पनपने लगती हैं मरीचिकाएं
चरमराने लगती है आकांक्षाओं की मीनार
तभी… अचानक होता है आभास
कि वो आम आदमी अब आम नहीं रहा
हो गया है खास
और फिर धीरे धीरे …..
उसे बुलंदियों का गुरूर होता गया
आम आदमी का वही चेहरा
आम आदमी से दूर होता गया
लोगों ने समझा नियति का खेल
हो लिए उदास …
कोई चारा भी नहीं था पास
लेकिन एक दिन
जब हद से बढ़ा संत्रास
(यही कोई ज़मीरी मौत के आस-पास )
फिर एक दिन अकुला कर
सिर झटक, अतीत को झुठला कर
फिर उठ खड़ा होता है कोई आम आदमी
भिंचती हैं मुट्ठियाँ
उछलते हैं नारे
निकलते हैं जुलूस ….
गढ़ी जाती हैं आकांक्षाओं की मीनारें
पकाए जाते हैं जज़्बात
तकरीर की भट्टियों पर
फिर एक भीड़ अनुगमन करती है
छिन्नमस्ता,……!
और एक बार फिर से
बैरीकेट्स फिर पसरते हैं
मंचों का कद बढ़ता है
वो आम आदमी का नुमाइंदा
इतना ऊपर चढ़ता है …
कि आम आदमी तिनका लगता है
अब आप ही कहिए… ये दोष किनका लगता है?
वो खास होते ही आम आदमी से दूर चला जाता है
और हर बार
आम आदमी ही छ्ला जाता है
चलिये कविता को यहाँ से नया मोड़ देता हूँ
एक इशारा आपके लिए छोड़ देता हूँ
गौर से देखें तो हमारे इर्द गिर्द भीड़ है
हर सीने मे कोई दर्द धड़कता है
हर आँख मे कोई सपना रोता है
हर कोई बच्चों के लिए भविष्य बोता है
मगर यह भीड़ है
बदहवास छितराई मानसिकता वाली
आम आदमी की भीड़
पर ये रात भी तो अमर नहीं है !!
एक दिन ….
आम आदमी किसी “खास” की याचना करना छोड़ देगा
समग्र मे लड़ेगा अपनी लड़ाई,
वक्त की मजबूत कलाई मरोड़ देगा
जिस दिन उसे भरोसा होगा
कि कोई चिंगारी आग भी हो सकती है
बहुत संभव है बुरे सपने से जाग भी हो सकती है
और मुझे तो लगता है
यही भीड़ एक दिन क्रान्ति बनेगी
और किस्मत के दाग धो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है ‘
मगर ये जाग हो कर रहेगी
थोड़ी देर भले हो सकती है
मगर ये जाग हो कर रहेगी

…… पद्म सिंह 09-09-2011(गाजियाबाद)
01 जुला 2011
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, हास्य व्यंग्य
Tags: Buzz, facebook, padm singh
कुछ समय पहले गूगल बज़ नया नया लाँच हुआ था. ब्लागरों की एक बड़ी जमात धीरे धीरे बज़ पर पहुँच गयी और देर रात दो दो तीन तीन बजे तक उधर ही अड्डेबाजी करने लगी. उसमे महामहिम समीरलाल जी, सर्वश्री ललित शर्मा जी, हिमांशु मोहन जी, शिव मिश्रा, शिवम जी, आनंद जी शर्मा, स्तुति पाण्डे, सुश्री अनुराधा जी (सॉरी आराधना चतुर्वेदी जी मुक्ति), राजीव नंदन द्विवेदी, प्रशांत प्रियदर्शी(PD), पंकज, डा- महेश सिन्हा, अजय कुमार झा, और इंदु पुरी जी जैसे दिग्गज देर रात तक बज़ फोड़ने में लगे रहते… धीरे धीरे जब बज़ का नशा कम हुआ तो सारे ब्लागर अपनी डेरा डंडी लेकर फेसबुक पर आ धमके हैं और यहाँ धमाल मचाने लगे हैं… पिछले दिनों अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने कुछ ऐसे मुद्दे दे दिए हैं कि उसी को लेकर सैकड़ों ग्रुप और धड़े तैयार हो गए हैं और खुले आम काँग्रेस और दिल्ली सरकार की फजीहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं… फेसबुक का नशा ऐसा कि कुछ भी करते रहो एक मिनट को ही सही कम्प्युटर की तरफ खिंचना पक्का… अपडेट देखा कमेन्ट किया फिर काम में…कई बार तो ज़रूरी काम भी छूट जाते हैं…कई दिन से सोच रहा हूँ अब अति हो रही है … लेकिन क्या करें कंट्रोले नहीं होता है…
तो मेरा ब्लागर भाइयों से निवेदन है कि मेरे प्यारे ब्लागर भाइयो … फेसबुक की बीमारी छोडो और अपना रुख ब्लागिंग की तरफ मोड़ो… इसी क्रम में एक तुरंती भी अर्ज है –
दिन भर चिपक के बैठे वेवजह बिना तुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
दिन भर लिखे दीवार पे गन्दा किया करे
अलसाये पड़े काम न धंधा किया करे
अपनी अमोल आँखों को अंधा किया करे
प्रोफ़ाइलें निहारीं किसी की किसी का लुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
हर ग्रुप किसी विचार का धड़ा खड़ा करे
रगड़ा खड़ा करे कभी झगड़ा खड़ा करे
मुद्दा कोई हल्का कोई तगड़ा खड़ा करे
कुछ हल न मिला ज्ञान की मुर्गी हुई कुडु़क
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
किस बात को बिछाएं क्या बात तह करें
कितना विचार लाएं कितनी जिरह करें
किस बात को किस बात से कैसे जिबह करें
तब तक मगज निचोड़ा जब तक न गया चुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
स्क्रीन पे नज़रें गड़ाए जागते रहे
छोड़ी पढाई और ज्ञान बाँटते रहे
पुचकारते रहे किसी को डाँटते रहे
जब इम्तहान आया दिल बोल उठा ‘धुक’
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
लाइक करूँ कि टैग करूँ या शेयर करूँ
चैटिंग से किसी की भला कितनी केयर करूं
जब तक दिमाग की चली मै भागता रहा
अब दिल ये कह रहा है बहुत भाग लिया रुक
तौबा ऐ फेसबुक मेरी तौबा ऐ फेसबुक
……पद्म सिंह
27 जून 2011
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता, poems
Tags: अन्ना, इण्डिया, क्रान्ति, भारत, मुद्दे, रामदेव, हिंदी, padam singh, padm singh, revolution

मुद्दे मुद्दे बहस छिड़ी हर चौराहे पर अनशन है
जनता के अधिकारों की सत्ता से गहरी अनबन है
राजनीति व्यापार हो गई कुर्सी मिले विरासत में
तानाशाह हुई सरकारें लोकतंत्र है सांसत में
लाज लुट रही है थानों में अस्पताल में मौत बंटी
थका बुढापा पिसता बचपन दिशाहीन सा यौवन है
फिर विकास के नाम छिने खलिहान खेत गोपालों के
कीर्तिमान फिर नए बने भ्रष्टाचारों घोटालों के
बाज़ारों की साख लुटी अड्डे बन गए उगाही के
लगे चरमराने सरकारी दफ्तर नौकरशाही के
लोकतंत्र की नींव हिली सरकारों की मनमानी से
डंडों से मुंह बंद कर दिए दुखड़ा कहने वालों के
चोर दलालों के जमघट हैं संसद के गलियारों में
सेंध लगा बैठे हैं गुण्डे जनता के अधिकारों में
मंहगाई ने सूनी कर दी है रौनक त्यौहारों में
डर लगता है बच्चों को लेकर जाना बाज़ारों में
मिलीभगत है भीतरखाने सत्ता और दलालों में
जिससे अँधियारा डर जाए वो हो रहा उंजालों में
एक तरफ आतंकवाद की फ़ैल रही बीमारी है
एक तरफ मंहगाई है तो एक तरफ बेकारी है
जनता भय से काँपे नेताओं पर पहरेदारी है
ए सी में खर्राटे लेती ये सरकार हमारी है
घुटन घुल गयी है मौसम में और हवा कुछ भारी है
कुंठित है जनमानस सूनी आँखों में बेजारी है
जाने कैसी बेचैनी है एक नशा सा तारी है
जैसे किसी क्रान्ति से पहले सुलग रही चिंगारी है
जिनको बड़े भरोसे से सत्ता में भागीदारी दी
आज उन्हीं सत्तासीनों ने जनता से गद्दारी की
भरी विदेशों में पूँजी जनता के खून पसीने की
बने आत्म हंता किसान मर कर दी कीमत जीने की
लुटी लाज बहनों की माताओं के सर सिन्दूर छिना
अभयारण्य बन गयी दिल्ली खल कामी गद्दारों की
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बुद्ध तुम सारों का
आवाहन करती है भारत माता आपने प्यारों का
भगत सिंह अब्दुल हमीद नेता सुभाष के नारों का
तुम्हें वास्ता देती हैं आज़ादी के मतवालों का
भ्रष्टाचार मिटाने की कर ली हमने तैयारी है
ज़रा लगाओ जोर दोस्तों यही रात बस भारी है
जिस गुमान में भूली होगी सत्ता सुन ले ध्यान से
पार नहीं पाया रावण जैसा ग्यानी अभिमान से
कबतक हनन किया जाएगा जनता के अधिकारों का
समय आ गया है अब शायद सत्ता के बीमारों का
निकल गया है मौसम अनुनय विनय और मनुहारों का
घड़ा भर गया लगता है सत्ता के पापचारों का
जनता का सेवक कब तक जनता को आँख दिखायेगा
रात भले काली हो एक दिन नया सवेरा आएगा
जिस दिन जनता की आँधी हर हर हर करती आएगी
कोई भी सिंघासन होगा पत्तों सा उड़ जायेगा
कोई भी सिंघासन होगा पत्तों सा उड़ जायेगा
..…पद्म सिंह २१-०६-२०११
23 जून 2011
by Padm Singh पद्म सिंह
in कविता
Tags: flower poem, India, maali
बगिया के फूलों ने
माली से पूछा यूँ
बोले क्यूँ हमको तुम
पहले तो पालो
सहलाते दुलराते हो
पानी देते हो
फिर खाद भी खिलाते हो
आखिर खिल कर हम
गुलनार जब हुए हों तो
तोड़ मुझे डाली से
कहाँ बेच आते हो
बोला माली सबके
दुनिया में आने के
अलग हैं उसूल और
लक्ष्य अलग होते हैं
कुछ अपनी किस्मत पर
रंज सदा करते हैं
जार जार रोते हैं
और कई ऐसे हैं
जो अपने जीवन को
परमारथ अर्पित कर
स्वयं को समर्पित कर
औरों के जीवन को
मह मह महकाते हैं
रंग से सजाते हैं
मै तो हूँ निमित्त मात्र
एक माध्यम हूँ मै
तुम्हारी वजह से
कुछ जिंदगी संवर जाएँ
खुशियों से भर जाएँ
इसी लिए चुन कर के
तुमको तुम्हारी ही
नियति से मिलाता हूँ
तुमको तुम्हारे ही
लक्ष्य से मिलाता हूँ ..
….पद्म सिंह
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