फिर से घनघोर घाटा छाई है अमराई मे
कहाँ हो आन मिलो शाम की तनहाई मे विरह की आग पे छींटे न दे अरे बादल
कहीं धुआँ न उठे फिर कहीं रुसवाई मे चाँद बेज़ार भटकता रहा सरे मंज़र
चाँदनी खोई बादलों की तमाशाई मे रूठने और मनाने को बहुत हैं मौसम
आज तो चूड़ियाँ मचलने दो कलाई मे पद्म खिलने लगे हैं झील मे कंवल ऐसे
जैसे केसर का रंग घुल गया मलाई मे -…. पद्म सिंह- 04-07-2012
कहाँ हो आन मिलो शाम की तनहाई मे विरह की आग पे छींटे न दे अरे बादल
कहीं धुआँ न उठे फिर कहीं रुसवाई मे चाँद बेज़ार भटकता रहा सरे मंज़र
चाँदनी खोई बादलों की तमाशाई मे रूठने और मनाने को बहुत हैं मौसम
आज तो चूड़ियाँ मचलने दो कलाई मे पद्म खिलने लगे हैं झील मे कंवल ऐसे
जैसे केसर का रंग घुल गया मलाई मे -…. पद्म सिंह- 04-07-2012










जुला 05, 2012 @ 08:46:45
वाह मनोरम अभिव्यक्ति
जुला 05, 2012 @ 10:15:51
आस बादल की थी, सुन्दर गजल बरस गयी..
जुला 05, 2012 @ 10:17:13
बढ़िया
जुला 05, 2012 @ 15:06:22
यकीनन अच्छी गजल है फिर भी बेहतर की प्रतीक्षा सदैव बनी रहेगी।
जुला 05, 2012 @ 19:37:44
सुन्दर गज़ल….
कोमल भाव………………
अनु
जुला 05, 2012 @ 19:41:02
पूरे मूड मे हो ठाकुर …
आपके इस खूबसूरत पोस्ट का एक कतरा हमने सहेज लिया है क्रोध की ऊर्जा का रूपांतरण – ब्लॉग बुलेटिन के लिए, पाठक आपकी पोस्टों तक पहुंचें और आप उनकी पोस्टों तक, यही उद्देश्य है हमारा, उम्मीद है आपको निराशा नहीं होगी, टिप्पणी पर क्लिक करें और देखें … धन्यवाद !
जुला 07, 2012 @ 22:51:14
bahut sundar ahasaas..
अग 06, 2012 @ 17:24:01
@ पद्म खिलने लगे हैं झील मे कंवल ऐसे
जैसे केसर का रंग घुल गया मलाई मे
M A S T
SADAR