कहाँ जाने खो गयी हैं आँधियाँ
क्यों नपुंसक हो गयी हैं आंधियाँ
युवा मन मे सो गयी हैं आंधियाँ मुट्ठियाँ सब बुद्धिजीवी हो गयीं
और तनहा हो गयी हैं आँधियाँ आज घर मे शान्ति है धोका न खा
अभी कल ही तो गयी हैं आंधियाँ शक्ति, साहस, और लड़ने की ललक
जाने क्या क्या बो गयी हैं आंधियाँ “पद्म” सच मे बदलना है दौर तो
जगाओ जो सो गयी हैं आंधियाँ पद्म सिंह 02/05/20012










मई 02, 2012 @ 20:24:45
“पद्म” सच मे बदलना है दौर तो
जगाओ जो सो गयी हैं आंधियाँ
अग्रिम क्षमा के साथ – मेरा भी आपसे यही कहना है – सादर
मई 02, 2012 @ 21:50:20
ठाकुर साहब,
आपसे जब भी मिला हूँ एक खामोशी की चादर ओढ़े मिले हैं आप.. यकीन मानिए, उसी खामोशी ने कभी आपसे खुलकर बात करने का मौक़ा न दिया.. सोचता रहा हूँ
.
आपसे जब भी मिला, सोचा यही,
मुस्कराहट में छिपी हैं आंधियाँ!
काले कपड़ों में उजाला मन छिपा,
क्यों न हो मातम हैं काली आंधियाँ!
(काली आंधी – कमलेश्वर, फिल्म आंधी – गुलज़ार)
.
देखिये कब आपसे बात करने का मौक़ा मिल पाता है!!
मई 03, 2012 @ 18:07:38
मुट्ठियाँ सब बुद्धिजीवी हो गयीं
और तनहा हो गयी हैं आँधियाँ
बहुत खूब .. बेहतरीन
मई 30, 2012 @ 17:41:48
सोई हुई आँधियों को जगाना बहुत भारी काम है..
क्योंकि ये आंधियां युवाओं में होनी चाहिए जो आजकल भटकी-बहकी सी लग रही है..
पर कोशिश जारी रहनी चाहिए क्योंकि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती..
अग 23, 2012 @ 12:50:03
शक्ति, साहस, और लड़ने की ललक
जाने क्या क्या बो गयी हैं आंधियाँ
bahut sundar panktiyan hain…
सित 01, 2012 @ 13:47:56
ho gaya barbad sab kuchh andhion me
aaj pyari ho gayi hain andhiyan,
ab hamara kuchh nahin kar payegi
ab tumhari ho gayi hain andhiyan,