अब जाग उठो अब कमर कसो जीवन की राह बुलाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है
भारत माता के वीर सपूतो धारा की पहचान करो
नावों के बंधन को खोलो पतवार उठा प्रस्थान करो
फिर नए लक्ष्य की चाह विजय की राह तुम्हें दिखलाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है
तंद्रा छोड़ो आँखें खोलो अब नए लक्ष्य संधान करो
तम की कारा को तोड़ फोड़ जगती का नव उत्थान करो
जब अपनी बाहों मे बल हो तो दुनिया पलक बिछाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है
अब प्रण की बारी आई है अब रण की बारी आई है
तन मन को जो दूषित कर दे वो रात दुधारी आई है
भारत माँ अपने बेटों को सत्पथ की राह बुलाती है
ललकार रही दुनिया हमको भेरी आवाज़ लगाती है












फ़र 13, 2012 @ 08:40:40
विश्व में अपना स्थान स्थापित करना होगा..
फ़र 13, 2012 @ 15:47:45
धन्यवाद आपका !!
फ़र 13, 2012 @ 15:21:23
आज दिनकर की आत्मा इस कविता में उतर आई है… एक आह्वान! एक सामयिक आह्वान!!
फ़र 13, 2012 @ 15:42:21
धन्यवाद आपका
फ़र 14, 2012 @ 12:12:06
sir ji ek hi baat kahunga..dinkar ji ki wo kavita ki parchai dikhi mujhe..jaise unki kavita padh kar mere roye khade ho jate hai, lahu ka sanchar tej ho jata hai..usi tarah aapki is kavita ko padh kar ek lahu ka tez sanchar hone lga hai…dinkar ji ki josh dilane wali kavita ke baad aapki kavita hi lagi mujhe…sir ji one of the finest poems i have read in my entire life…thanks for creating it
फ़र 14, 2012 @ 20:11:51
नाम तो बता देते मित्र !
फ़र 14, 2012 @ 15:40:07
सामायिक/सार्थक/ खुबसूरत रचना…
फ़र 14, 2012 @ 17:46:48
सच में देशभक्ति में डूबी रचना
फ़र 23, 2012 @ 10:54:10
दिनकर की याद दिला दी आपने। बहुत खूबसूरत लगा।