सविनय अर्ज़ है -
रहिमन जूता राखिए, बिन जूता सब सूनबिन जूता होने लगे, भ्रष्टाचारी दून जूता मारा तान के, लेगई पवन उड़ाय
जूते की इज्ज़त बची, प्रभु जी सदा सहाय साईं इतना दीजिये, दो जूते ले आँय
मारूँ भ्रष्टाचारियन, जी की जलन मिटाँय जूता लेके फिर रही, जनता चारिहुं ओर
जित देखा तित पीटिया, भ्रष्टाचारी चोर कबिरा कर जूता गह्यो, छोड़ कमण्डल आज
मर्ज हुआ नासूर अब, करना पड़े इलाज रहिमन जूता राखिए, कांखन बगल दबाय
ना जाने किस भेस मे, भ्रष्टाचारी मिल जाय (अ)निर्मल हास्य ….. पद्म सिंह










जन 24, 2012 @ 11:44:03
सही जूता मार के …व्यंग्य है
जन 24, 2012 @ 11:46:25
जूता छंद पढकर आनन्द भयो
प्रणाम
जन 24, 2012 @ 12:02:07
kal deepak baba ji ne juto ka haspatal dikhaya thaa …aur aaj aap ki juta chand pad liya ….
jai baba banaras………..
जन 24, 2012 @ 12:41:56
Nice !
जन 24, 2012 @ 12:57:02
Bahut accha bhrashtrachaar ke khilaaf
जन 24, 2012 @ 15:27:29
बड़ा ही उपयोगी संदेश…
जन 24, 2012 @ 16:11:42
दिल खुश कर दिया पद्म जी! एक हमारी भी,
जूता चरण ते खोलिए, मारिये जोर लगाय,
भ्रष्टाचारी नेता को, चहियत इहै सजाय!
जन 24, 2012 @ 16:27:40
अच्छा व्यंग्य काव्य..
जन 25, 2012 @ 01:43:16
सर्वजन सुखाय, सर्वजन सुखाय।
फ़र 26, 2012 @ 23:44:56
maza aa gayo bhaya