सर सर चलती हवा रात दिन तन उठता है काँप
जाड़े मे है कठिन नहाना बम्बा लगता साँप….
सर्दियाँ अपने चरम पर हैं। ऐसे मे लिहाफ मे घुस कर फेसबुक और ब्लाग पर राष्ट्र हित की लड़ाई लड़ते समय पत्नियाँ कभी भी विषय और समय की गंभीरता को नहीं समझ पाती हैं, और आठ बजते बजते संसद (धोती/गृह मंत्रालय) की सर्वोच्चता का हवाला देते हुए नहाने का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर देती हैं। ऐसे मे फेसबुकीय बालाओं के सुप्रभात और शुभकामना संदेशों से आनंदित “पुलकावली सरीर” भय से काँप उठता है। ऐसे मे “चुनी हुई” प्रतिनिधि का हम “छंटे हुए” लोग कुछ भी नहीं कर पाते और जबरन हमें शरद-शत्रु बम्बा-सर्प के सानिध्य मे धर दिया जाता है। अब इन्हें कौन बताए कि नहाते तो गंदे लोग हैं… वैसे ही …जैसे पुण्य वो करते हैं जो अपने पाप से डरते हैं … यहाँ तो मन चंगा और कठौती मे गंगा… लेकिन कठौती का जल भी कितना कीमती है !!!…. जल ही जीवन है और जीवन की रक्षा करना जीव मात्र का स्वभाव और कर्तव्य है।
जल के महत्व के कारण ही दुनिया की तमाम सभ्यताओं को नदियों और समुद्रों के जल ने पाला पोसा… परन्तु मनुष्य ने कृतघ्नता की सीमा तोड़ते हुए हुए नहाने की आदत डाल ली… और सबसे ज़्यादा जल बर्बाद करने वाला जीव बन गया। जहां सरकार से लेकर तमाम स्वयं सेवी संस्थाएं जल बचाने की अपील करते नहीं थक रही हैं, वहीं मनुष्य अपने जीवन मे लाखों लीटर शुद्ध जल केवल नहाने पर खर्च कर देता है। इसके लिए सबसे अधिक भारत जैसे विकासशील देश जिम्मेदार हैं, जहाँ आज भी दक़ियानूसी (Old fashioned) लोग रोज़ नहाने जैसी रूढ़िवादी परम्परा के वाहक हैं। कुछ लोग आधुनिक कहलाने के चक्कर मे यूँ तो अंग्रेजों की छोड़ी हुई चड्डी तक को अपना खानदानी झण्डा बनाने मे गर्व महसूस करते हैं, परंतु उनका हफ्तों न नहाने का मूलमंत्र आज तक नहीं अपना पाये । समझ मे नहीं आता ऐसे लोग कब और कैसे विकसित होंगे।
मॉल और मल्टीस्टोर्स संस्कृति के ज़माने मे रोज़ नहाने वाले देश को लाखों रूपये के राजस्व और टैक्स का चूना लगा रहे हैं। रोज़ नहाने से जहाँ डियोडरेंट बनाने वाली कंपनियाँ निरंतर घाटे मे जा रही हैं वहीं टिश्यू पेपर,हेयर जेल, फेस वाश, क्रीम और पाउडर की बाज़ार ठंडी पड़ी हुई है। खैर मनाइए आज के कुछ विकासवादी आधुनिक युवाओं का, जिन्होंने जल बचाने के लिए कौवा-स्नान जैसे आधुनिक तरीके विकसित कर लिए हैं जिसके अंतर्गत चारों पंजे और गर्दन से ऊपर का हिस्सा जो आम जनता के दर्शनार्थ खुले होते है, को जलाचमन अथवा के द्वारा शुद्ध करने का प्रावधान है।
अपने आप को धार्मिक और मार्मिक मानने वाले भी समझ लें कि रोज़ नहाने वालों को सीधे सीधे जीवहत्या का पाप लगता है। नहाने वाले कभी सूक्ष्मदर्शी लेकर तो नहाते नहीं, उन्हें क्या पता कि उसके एक बार नहाने से लाखों निरीह जंतुओं की बस्तियाँ एक लोटे सुनामी से ही तबाह हो जाती हैं। अकारण ही वे त्वचारोमों के अभयारण्य मे विचरण करते हुए और रोम कूपों के रक्त से अपनी पिपासा शांत करते जंतुओं की हत्या के भागी बनतेहैं। इस जघन्य समूहिक संहार के हम “सः नाववतु सः नौ भुनक्तु” की अवधारणा को भी बिसरा देते हैं, और ‘अपने ही खून’ की हत्या कर बैठते हैं।
एक बार नहाने से औसतन बीस लीटर बहुमूल्य जल की क्षति होती है। और सर्दियों मे तो नहाने का खर्च ही बहुत है । पानी गरम करने की मशीन, गरम करने के लिए बिजली का खर्च, और नहाने से हुए सर्दी बुखार के लिए डाक्टर का खर्च, सब मिला कर नहाना एक घाटे के सौदे के सिवा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त साबुन, शैम्पू, कंडीशनर, कलोन, जैसे फालतू खर्च अलग। इन्हीं समस्याओं को ध्यान मे रखते हुए पण्डितों ने आचमन की अवधारणा को जन्म दिया। बस आचमनी मे जल लीजिये और मन्त्र बोलिए “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु “…… और सिर के ऊपर छिड़क लीजिये। जब एक आचमनी मे सातों नदियों का स्नान संभव है तो शरीर को खामखा कष्ट क्यों देना।
यूं भी अनुभवी लोगों ने केवल तीन स्नान ही महत्वपूर्ण बताए गए हैं, जन्म के समय, विवाह के समय और अंतिम स्नान… फिर बीच मे नहा कर उनके अनुभवों का महत्व कम क्यों करना। अगर ज़्यादा ही इच्छा हो तो मकरसंक्रान्ति का स्नान अपवाद स्वरूप लिया जा सकता है। फिर भी कुछ लोग रूढ़िवादी होते हैं और गाहे-बगाहे स्नान करने का दुस्साहस कर बैठते हैं, क्योंकि उन्हें स्नान के सही समय का पता नहीं होता। फिर भी लकीर के फकीरों के लिए स्नान करने के समय का पता करने का एक आसान सा तरीका ज्ञानियों ने और बताया है…जब खुजाने की दिशा होरीजेंटल से बदल कर वरटिकल हो जाये तो समझ लेना चाहिए कि अब वह उचित समय आ गया है।
वर्षों से भारत देश की विडम्बना रही है कि तमाम ज्ञानी अपने ज्ञान को बिना किसी को बांटे चले गए… इसी लिए …यह लेख मैंने उन पीड़ित पुरुषों के लिए लिख दिया जो गृह मंत्रालय की ज़्यादतियों के शिकार हैं, ताकि सनद रहे …. और वक्त पर काम आए….अगर कोई भीगी बिल्ली बने रहना नहीं चाहता ….तो इस लेख को हृदयंगम कर ले,… गृह मंत्रालय तक पहुँचा दे ….अन्यथा बना रहे लकीर का फकीर, रूढ़िवादी, पिछड़ी सोच का।










जन 02, 2012 @ 20:13:34
हा हा हा हा हा हा …स्नान…पुराण इस से पहले कभी इतना मजेदार नहीं लिखा गया होगा …..
बस आचमनी मे जल लीजिये और मन्त्र बोलिए “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु “…… और सिर के ऊपर छिड़क लीजिये। जब एक आचमनी मे सातों नदियों का स्नान संभव है तो शरीर को खामखा कष्ट क्यों देना।………..बहुत ही बढिया है जी …
जन 02, 2012 @ 20:33:58
ज्ञान तो भईया हम ले लिए … अब इतना भी बता दो … आप ने क्या किया …
जन 02, 2012 @ 20:36:57
मेरे ब्लॉग के पठनकाल का सर्वाधिक सुरुचिपूर्ण लेख और आज से आपकी गिनती ..हमारे नज़र में अच्छे लेखकों की फेहरिस्त में होगी .. !!
जबरदस्त ..!!!
जन 02, 2012 @ 20:47:13
बस आचमनी मे जल लीजिये और मन्त्र बोलिए “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु “…… और सिर के ऊपर छिड़क लीजिये। जब एक आचमनी मे सातों नदियों का स्नान संभव है तो शरीर को खामखा कष्ट क्यों देना।
हा हा हा हा
गजब लिखा है …
जन 02, 2012 @ 21:04:16
हम तो आपके शिष्या हैं गुरुदेव! आपकी आज्ञा शिरोधार्य.जो भूल भूले भटके हमसे हो ही गई है उसके लिए क्षमा करे.दो स्नान कर चुके तीसरा करवा ही दिया जायेगा.ऐसी भयानक ठंड मे मरने का इरादा नही मेरा.उसके लिए भी कोई उपाय बता देते गुरुदेव! तो…….. वसीयत मे लिख जाती.
काश हमारे देश मे आपके जैसे और…थोरे थोरे मेरे जैसे लोग हो तो पानी की कमी कभी ना आए.ये नहाने वाले अपनी भावी पीढ़ियों के लिए क्यों नही सोचते? उनके पीने के लिए जरूरी कामों के लिए तो हमे पानी छोडकर जाना ही चाहिए…..लिख जायेंगे कि जो हमने किया उतना वो अपनी पीढ़ियों के लिए करे……….नहाये ना.बस.जय जो पद्मानंद जी महाराज की.
जन 02, 2012 @ 21:05:13
कुछ न कुछ कर के उनका उत्पाद बिक भर जाये।
जन 02, 2012 @ 22:12:06
“गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती । नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु “ ये आईडिया बढिया है अगर कामयाब हो जाए तो।:))
जन 02, 2012 @ 23:01:11
शायद इसी सूत्र का अनुपालन करते हुए किसी आदिम मनुष्य ने ड्राई-क्लीन पद्धति का आविष्कार किया होगा… कपड़ों की नहीं, मनुष्यों की.. वह पद्धति, जिसके अंतर्गत मनुष्य स्वयं को वस्त्रगत करता हुआ नग्न अंगों पर हलके जल का छिडकाव कर एक ऐसी छवि प्रत्यारोपित करता है जिससे आभास होता है कि वह अतिप्राचीन रूढ़िवादी परम्परा, जिसे स्नान कहते हैं, का अनुपालन कर रहा है!!
अच्छा सूत्र!!!
जन 03, 2012 @ 07:28:44
सर सर चलती हवा रात दिन तन उठता है काँप
जाड़े मे है कठिन नहाना बम्बा लगता साँप….
मज़ा आगया पोस्ट पढ़ कर …..अब कभी नहाने को नही कहूंगी जल ही जीवन है ….:)
जन 03, 2012 @ 09:41:59
जन 03, 2012 @ 14:13:50
शुक्रिया कानुप्रिया जी
जन 03, 2012 @ 10:33:16
बड़े बड़े बाबु लो के तीन गो नहान ,फाल्गुन ,सतुआ और ………….हा हा हा !!
हास्य के माध्यम से जिस प्रकार आपने कास्मेटिक कंपनियों की कलई खोली है ……जबरजस्त है ,
बेजोड लेख है हुक्म ,ऐसे लेखो को समझने की क्षमता नहीं है हमारे पास और ना ही प्रशंसा के लिए शब्द ……Mindblowing
जन 03, 2012 @ 12:10:47
हा हा हा हा,मजा आ गया पढ़कर, गजब लिखा है …इसे ज्ञानवर्द्धक पोस्ट कहूं या रोचक , समझ नहीं पा रहा मगर है दिलचस्प !
जन 03, 2012 @ 18:14:15
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार – आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है ‘ब्लॉग बुलेटिन’ पर – पधारें – और डालें एक नज़र – मुस्कराते – हँसते बीते २०१२ – ब्लॉग बुलेटिन
जन 04, 2012 @ 08:28:01
जाड़े में गाँव में कुएं और नल के ताज़े पानी में नहाने का मज़ा अलग ही था,बिलकुल गरम पानी निकलता था !
जन 04, 2012 @ 10:56:15
ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha maja aa gaya
जन 04, 2012 @ 15:28:57
नहाये नहीं है, और .अब नहायेंगे भी नहीं (परमीशन जो मिल गई है ) कितना पानी काम आयेगा..वैसे भी सामान्य से तो ज्यादा ही नष्ट होता रहा होगा इतनी बड़ी काया पर ..:-)
जन 04, 2012 @ 15:37:30
vyang bahut badhiya hai hamara aana deri se huya ……tab tak ham naha chuke the..
jai baba banaras………
जन 04, 2012 @ 20:03:22
कुछ लोग आधुनिक कहलाने के चक्कर मे यूँ तो अंग्रेजों की छोड़ी हुई चड्डी तक को अपना खानदानी झण्डा बनाने मे गर्व महसूस करते हैं!!!!!!!… हा हा हा …!!!!!!!! आप के इन वर्जिन कहावतों कि तलाश में मै आपके ब्लॉग तक खिंचा चला आता हूँ. धन्यवाद.
जन 05, 2012 @ 13:40:21
मज़ा आ गया .. वाकई निर्मल हास्य है …
आपको नव वर्ष की मंगल कामनाएं …
जन 07, 2012 @ 23:08:06
इन सर्दियों में भाभी जी द्वारा जो अत्याचार आप पर किये जा रहे हैं उन्हें आपने बखूबी कलमबद्ध कर डाला. भाभी जी से कहेंगे कि भैया पर इतने ज़ुल्म न ढाएँ, चाहे बेशक भैया जी पूरी सर्दी न नहायें…
अब खुश हो…
जन 08, 2012 @ 10:24:49
स्नान पुराण अच्छा लगा।
हमें भी ऐसा ही महसूस होता है।
जन 08, 2012 @ 19:38:33
वाह भैया मज़ा आ गया.
जन 11, 2012 @ 06:06:19
राम राम जी….
जल है तो कल है….. ये सत्य अटल है… और हम कोई ये मलिन शरीर मात्र थोड़े ही है… हम तो शुद्ध-बुद्ध आत्मा निर्मल है….!
पदम् जी; आपकी बातो में बल है!
कुँवर जी,
जन 11, 2012 @ 22:23:32
waah