रजाई के वीर और वीरांगना तो थे पर …..तुम जैसा भी कोई नही था वहाँ.लेपटोप चालु करके नींद निकल रहेथे और जितनी बार उसे बंद करने के लिए मैंने बोला,जवाब मिला -’सो नही रहा..देख रहा हूँ ‘ और हम सब हँसते हँसते लोटपोट हो गये.रात को ढाई बजे चुपके से बंद किया तुम्हारा लेपटोप हा हा हा
बेशक कभी ना भूलने वाला समय जिया था वहाँ हमने.
जन 02, 2012 @ 21:25:39
रजाई के वीर और वीरांगना तो थे पर …..तुम जैसा भी कोई नही था वहाँ.लेपटोप चालु करके नींद निकल रहेथे और जितनी बार उसे बंद करने के लिए मैंने बोला,जवाब मिला -’सो नही रहा..देख रहा हूँ ‘ और हम सब हँसते हँसते लोटपोट हो गये.रात को ढाई बजे चुपके से बंद किया तुम्हारा लेपटोप हा हा हा
बेशक कभी ना भूलने वाला समय जिया था वहाँ हमने.
जन 02, 2012 @ 21:46:04
जो रात भर सो नहीं पाये वो कैसे रज़ाई के वीर थे… अपन तो सो भी रहे थे और सब कुछ देख भी रहा था…. और सिरहाने चार किलो गज़क भी रखी थी